' तीसरा बम '

बात सन 1990 के आसपास की है नई – नई शादी हुई थी मेरी अरे मैं यानी सयुंक्ता । ससुराल में कंप्यूटर का कारोबार…कंप्यूटर इस नाम से भी उस वक्त ज्यादातर लोग अनजान थे , मुझे भी ऐसो की ही पंक्ति में खड़ा कर दिया गया कंप्यूटर के पास जाते ही देवर ने चिल्ला कर कहा ‘ इसको मत छूईयेगा ‘ एक बार को उसको चिल्लाते देख लगा की बम फूटा , ये कंप्यूटर को लेकर फूटने वाला पहला बम था । उन दिनों मेरी सहेली कंप्यूटर कोर्स कर रही थी कभी – कभी मेरे पास आकर रूक जाती रात में वो कंप्यूटर पर काम करती मैं बगल में बैठ उसको काम करता देखती और हम दोनों गप्पे भी करते । थोड़े दिनों में मैं ‘ अडोब इलैस्ट्रेटर ‘ पर विज़िटिंग कार्ड डिजाइन करने लगी मेरा हाथ बहुत अच्छा सैट हो गया । मुझे कार्ड डिजाइन करता देख घर में दूसरा बम फूटा…अचानक से एक दिन देवर ने आकर कहा भाभी आप मुझे ‘ अडोब इलैस्ट्रेटर ‘ सीखा देंगी ये तीसरा बम फूटा था लेकिन इसकी आवाज मेरे कानों को मीठी लग रही थी ।

स्वरचित एवं मौलिक
( ममता सिंह देवा , 13/12/2020 )

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" लेखन से अपने मन को संतुष्ट और लेखनी को मजबूत करती हूँ " मैं...
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