तीन तलाक

खुश हो लिए तुम तीन बार तलाक कह कर,
पता है मन भर गया है तुम्हारा साथ रह कर।

एक पल को भी नहीं सोचा कहाँ जाऊँगी मैं,
क्या तुम्हारा दिया यह दुःख सह पाऊँगी मैं।

सबने मंजूरी दे दी तलाक को बिना इजाजत,
खुदा का भी खौफ रहा नहीं आएगी कयामत।

क्या भविष्य रहेगा मेरे बच्चों का नहीं सोचा,
ज़िस्म को क्या तुमने मेरी रूह को भी नोचा।

बोलो कोई तो क्यों मैं बार बार निकाह पढ़ाऊँ,
कोई पशु नहीं हूँ जो हर रोज खूँटे बदले जाऊँ।

क्या होगा जब दूसरे तीसरे का मन भर जाएगा,
बूढ़ी हो जाऊँगी ऐसे ही मैं, कौन साथ निभाएगा।

तलाक के साथ मेहर देकर अहसान जताते हो,
साथ में जवानी के वो साल क्यों नहीं लौटाते हो।

बराबरी का दर्जा मुझे भी चाहिए ये मेरा हक है,
गलत फायदा उठा रहे हो तुम कोई नहीं शक है।

मेरी जिंदगी का फैसला दूसरे करें ये मंजूर नहीं,
जब बदला जाएगा रिवाज अब वो दिन दूर नहीं।

सुलक्षणा एक साथ लड़नी होगी ये लड़ाई हमें,
वरना जीने नहीं देंगे चैन से ये मर्द अन्यायी हमें।

©® डॉ सुलक्षणा अहलावत

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