गज़ल/गीतिका · Reading time: 1 minute

तिश्नगी दिल की वो बढ़ाते हैं

तिश्नगी दिल की वो बढ़ाते हैं
दुश्मनी हमसे ज्यों निभाते हैं

बेहयाई तो देखिये उनकी
ज़ख्म देते हैं मुसकुराते हैं

लूट लेते हैं वो ही गुलशन को
जिनको हम बागबाँ बनाते हैं

मंज़िलें साथ छोड़ जाती है
रास्ते ही वफ़ा निभाते हैं

एक छोटी सी बात में कितने
लोग मफ़हूम ले के आते हैं

फूल आए न आए हिस्से में
ख़ार से ज़िंदगी सजाते हैं

लोग दौलत के वास्ते ‘माही’
आदमीयत को बेच जाते हैं

माही

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