तारे

श्वेत धवल किरणें लिए, निकले चाँद- सितार।
रोज दिवाली है गगन, सजते दीप हजार।।१

टिम-टिम कर हँसते मगन, तारों का संसार।
हँस-हँस सबको बाँटते, किरणों का उपहार।।२

रात-रात भर जाग कर, हमें दिखाते राह।
झिलमिल सब हँसते रहे, यह तारों की चाह।।३

नवल रवि रश्मि सी चमक, तारों का अंगार।
छवि मुक्ता-सी शोभता ,अंबर का श्रृंगार।। ४

पवन चले कुहरा पड़े, बारिश की बौछार।
फिर भी नभ में बिन मिटे, जलते रहे सितार।।५

तारों की लड़ियाँ लगे, ज्योति शक्ति का सार।
बिना स्वार्थ ही बाँटता, सबको अपना प्यार।। ६

आँख मिचौनी खेलता, मुक्त गगन के द्वार।
टुकुर-टुकुर सब देखता,खड़ा मौन उस पार।। ७

ये प्रहरी बन कर जगे, सोते जब संसार।
मौन कथा कहते रहे, सुख से पृथक विचार।। ८

-लक्ष्मी सिंह

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