तांडव मंत्र कोरोना

रूप है बङा प्रचण्ड ।
फैला ये खण्ड -खण्ड।
चीत्कार से इसके सभी ।
धरा है पूरा झण्ड -झण्ड।
शोक, रोग से पूरा हुआ ।
मटियामेट सब यहां ।
कैसा ये भूकम्प है ।
मच रही हड़कम्प है ।
कोरोना का रोना यहाँ ।
न जाने किसका घमंड है ।
भ्रष्टाचार और दम्भ का फैला ये पाखण्ड है ।
घर से न निकले कोई पी एम का यही संदेश है ।
मंद -मंद बह रही हवाए क्यो स्वच्छंद है ।
आप अपनी सुरक्षा खुद करे ।
नही तो फिर आगे मरे ।
विश्व की महामारी से सब पीड़ित यहां छोर है ।
मरे रहे रोग ऐसे क्यो ।
ये कैसा महाभारत का युद्ध है ।
जो मर रहे बिना बाण और भाल के ।
ये वैश्विक महामारी का निनाद है ।
समझ मे हमको न आ रहा ।
ये कैसा भाई आतंक का डोर है ।
ये कोरोना हमको लगे कोई आदमखोर है ।
खाती चली जा रही इंसान की पौध है ।
ये आ रही मिट्टी से कैसी खुशबू सोंध है ।
हाथ मुंह को धोकर सब भावविभोर है ।
गर्दन लटकाए सभी आफत चहुंओर है ।
ये कोरोना का कैसा हिलकोर है ।
सुनामी से इसके सभी भीग कर पोर पोर है ।
जैल बना कैदखाना ऐसा लगे कोई चोर है ।
पर जो भी है मां बाप के सामने बढता मेल -जोल है ।
हे ! प्रभु रूद्र जी नतमस्तक आपके चरणो मे ।
समर्पित पुरा जहान अघोर है ।

Rj Anand Prajapati

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