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तहरीर ये मेरे हाथों की जंजीर तेरी ना बन जायें

Anish Shah

Anish Shah

गज़ल/गीतिका

October 10, 2017

ख्वाबों की चिता सजाये हूं ,आके इसे जला देना।
आंखों मे बसी तस्वीर मेरी ,अश्कों के साथ बहा देना।।

चलके साथ कुछ ही लम्हा,छोड़ दिया मुझको तन्हा।
गुमराह हो गया मंजिल से,मुझको राह दिखा देना।।

अब कोई रंग न फीका हो,आखिर तुम दुल्हन हो हमदम।
हाथों की मेंहदी में मेरा, खूनै-जिगर मिला देना।।

तहरीर ये मेरे हाथों की ,जंजीर तेरी न बन जाये।
रुसवा न कहीं कर दे तुमको, खत मेरे सभी जला देना।।

थी मेरी तमन्ना मैं सोता , तेरी जुल्फों के साये में।
अब गहरी नींद सुला करके, आंचल का कफ़न उढ़ा देना।।

इस जिंदगी के सह़रा में, “अनीश” प्यासा है कब से।
इक जामे-मुहब्बत दे न सको, तो फिर जह़र पिला देना।।

Author
Anish Shah
अनीश शाह " अनीश" (अध्यापक) एम. एस. सी (गणित) बी. एड. निवास-सांईखेड़ा ,नरसिंहपुर (म.प्र.) मो. 7898579102 8319681285
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