तश्वीर तेरी

आलमारी में रखी किताबों को झाड़ते हुए
मैंने पाया तुझे,डायरी को फाड़ते हुए

किताबों के बीच से जब गिरी तेरी तश्वीर
लगा!कलेजे पर रख दिया किसी ने शमशीर

तेरी यादों की फसल को काटा था मैंने खंजर से
एक पल में सब याद आ गया इस नए मंजर से

उठाकर जब मैंने निहारा, नजदीक से तेरी तश्वीर
मानो मिल गया मुझको तेरा फिर से नया मुखबीर

एक पल में तश्वीर तेरी यादें ताज़ा कर गयी
मुझे लगा,जैसे तू मुझको फिर से मिल गयी

जनता हूँ कोई मतलब नही अब तेरी चाहत का
न कोई रास्ता ही है बचा अब मेरी राहत का

मन के भावों को समेट कर “सोमेश” ने वैसे रख लिया
जैसे तश्वीर को तेरी,किताबों में फिर से तह दिया
सोमेश त्रिपाठी “निर्झर”

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