तम से लड़ी है जिंदगी

मौत है निष्ठूर निर्मम तो कड़ी है जिंदगी
जो ख़ुशी ही बाँटती हो तो भली है जिंदगी

लोग जीने के लिए हर रोज मरते जा रहे
ये सही है तो कहो क्या अब यही है जिंदगी

दो निवालों के लिए दिनभर तपाया है बदन
या कि मानव व्यर्थ चाहत में तपी है जिंदगी

झूठ माया मोह रिश्ते सब सही लगते यहाँ
जाने कैसे चक्रव्यूहों में फँसी है जिंदगी

काठ का पलना कहीं तो खुद कहीं पर काठ है
है हँसी कोमल कहीं आँसू भरी है जिंदगी

चाँद भी रातों को रोशन कर चुका है तो कहो
किन उजालों के लिए तम से लड़ी है जिंदगी

आसमां के पार भी इक आसमां तैयार है
ख्वाब बुन लो तो चलो कहती रही है जिंदगी.

~ अशोक कुमार रक्ताले.

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