गज़ल/गीतिका · Reading time: 1 minute

तमाम जिस्म की नज़र बना के देखिये हुज़ूर

तमाम जिस्म की नज़र बना के देखिये हुज़ूर
दुनियाँ-ए-नज़र सि नज़र बचा के देखिये हुज़ूर

क्या इम्तिहान-ए-ज़ब्त अगर वो सामने नहीं
रु-ब-रू दिल पर क़ाबू रख के देखिये हुज़ूर

नुक्ताचीन् और क्या है सिवा कसरत-ए-लफ्ज़
हाज़िर -जवाब सि झूठ बोल के देखिये हुज़ूर

झूम ही लेता है क़ामयाबी में हर कोई
नाकामियों की इज़्ज़त कर के देखिए हुज़ूर

कहते हैं दुनियाँ की हर चीज़ में रूह होती है
ज़रा उसको भी लरज़ा कर के देखिये हुज़ूर

सीधी –सीधी बातों से कुइ काम नहीं होता
बोल के उल्टा उल्टा कर के देखिए हुज़ूर

तेरा नक्श-ए-पा होगा ‘सरु’ क़िस्मत की लक़ीर
क़दम- दर- क़दम आगे बढ़ा के देखिए हुज़ूर

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