Skip to content

तब तुम लौट आना पिय।

डॉ. शिव

डॉ. शिव "लहरी"

कविता

April 29, 2017

फूलों से लद जाये उपवन,
भ्रमर सब गुन गुनगायें।
सुगंध बहकाये तन मन,
तब तुम लौट आना पिय।।
अम्बर में भर जाये गर्जन,
तटनिया हिचकोले खाये।
धरा करे जब नवसृजन,
तब तुम लौट आना पिय।।
विभावरी ओड़े सितारें जड़ी,
चकोर को यूँ शशि बुलाये।
आसमां निहारती ठिठुरी खड़ी,
तब तुम लौट आना पिय।।
खुशियों से भरजाये चितवन,
हरपल नयन दर्पण दिखलाये।
भरने को व्याकुल खाली अयन,
तब तुम लौट आना पिय।।
मैं हरबार जीती पिय तुम हारे,
अब तुम जीते मै हारी हिय।
मन जब जब तुझ को पुकारे,
तब तुम लौट आना पिय।।
(रचनाकार-डॉ शिव’लहरी’)

Share this:
Author
डॉ. शिव
साहित्य सेवा के रूप में सामाजिक विकृतियों को दूर करने में व्यंगविधा कविता रूप को लेखन में चुना है।

क्या आप अपनी पुस्तक प्रकाशित करवाना चाहते हैं?

साहित्यपीडिया पब्लिशिंग से अपनी पुस्तक प्रकाशित करवायें और आपकी पुस्तक उपलब्ध होगी पूरे विश्व में Amazon, Flipkart जैसी सभी बड़ी वेबसाइट्स पर

साहित्यपीडिया की वेबसाइट पर आपकी पुस्तक का प्रमोशन और साथ ही 70% रॉयल्टी भी

साल का अंतिम बम्पर ऑफर- 31 दिसम्बर , 2017 से पहले अपनी पुस्तक का आर्डर बुक करें और पायें पूरे 8,000 रूपए का डिस्काउंट सिल्वर प्लान पर

जल्दी करें, यह ऑफर इस अवधि में प्राप्त हुए पहले 10 ऑर्डर्स के लिए ही है| आप अभी आर्डर बुक करके अपनी पांडुलिपि बाद में भी भेज सकते हैं|

हमारी आधुनिक तकनीक की मदद से आप अपने मोबाइल से ही आसानी से अपनी पांडुलिपि हमें भेज सकते हैं| कोई लैपटॉप या कंप्यूटर खोलने की ज़रूरत ही नहीं|

अधिक जानकारी के लिए यहाँ क्लिक करें- Click Here

या हमें इस नंबर पर कॉल या WhatsApp करें- 9618066119

Recommended for you