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तब तब शिव ताण्डव होता है…

अरविन्द दाँगी

अरविन्द दाँगी "विकल"

कविता

March 3, 2017

जब देश सोया सोया सा रहता है…
युवा कमरे में खोया रहता है…
बुद्धिजीवी सुस्ताने लगते है…
बंद कमरों में न्याय कराने लगते है…
जब अंधकार प्रकाश को खाता है…
अहम् मानव पर चढ़ सा जाता है…
सूरज चन्दा सा हो ये जाता है…
कांधो पर बोझ बेटों का आता है….
अधरों पर स्वाद कड़वा ही आता है….
जब जीवन क्रदन करता है…
काल ताण्डव गर्जन करता है…
हवा रुग्ण जब हो जाती…
माटी में नमी सब खो जाती…
जब पाप पुण्य पर भारी हो…
नैनो में अश्रु अविरल से हो…
जब चहुँ और बस विकल हृदय हो…
जब धरती बोझ सह न पाती…
तब तब शिव ताण्डव होता है…
तब तब शिव ताण्डव होता है…

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✍अरविन्द दाँगी “विकल”

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Author
अरविन्द दाँगी
जो बात हो दिल की वो कलम से कहता हूँ.... गर हो कोई ख़ामोशी...वो कलम से कहता हूँ... ✍अरविन्द दाँगी "विकल"

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