Mar 1, 2017 · कविता
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तबाही का मंजर

हैराँ है धरती परेशां है अम्बर
बतला रहा है तबाही का मंजर ।
पापों की गर्मी से कांपे ये धरती
विष की घटा से ढँका है ये अम्बर ।।

किसी की हो करनी किसी को हो भरनी
बतला ही देता तबाही का मंजर ।
पछताओगे क्या ?अपने किये पर
अब खुद के ही सीने में खुद का है खंजर ।।

मानो भी सच को न मानोगे कब तक
झुठी ये दुनियां झूठा बबंडर ।
हम भी न होंगें तुम भी न होंगे
बनाते रहे गर हम धरती को बंजर ।।

हमारी हो श्र्द्धा हम विश्वास उनका
देखा है जिनने तबाही का मंजर ।
मानो न मानो तुम्हारी ख़ुशी है
देखेंगे हम भी तबाही का मंजर ।।

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sunil soni
sunil soni
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