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तन्हा जिंदगी

तन्हा ज़िन्दगी
दिल के तार-तार,हो चले बेजार
लुटे ऐतवार के हुए चिथड़े हज़ार।
अब पैबन्द सीकर क्या होगा?
तेरे हुश्न-ए-नूर से हुआ शुरुर।
फिर पीने को न कर मजबूर।
जब मद की मस्ती जाती रही,
तो जाम ही पीकर क्या होगा?
चलने की तो थी ललक बहुत।
जीने के लिये ईक झलक बहुत।
पर रहा सिफर,कुछ मिला नहीं।
ख़ैर, गम भी नहीं तो गिला नहीं।
जब तुम्हीं साथ दे न सके
तब तन्हा जीकर क्या होगा ?
-©नवल किशोर सिंह

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