गज़ल/गीतिका · Reading time: 1 minute

तन्हाईयाँ

नाम लिख के मिटाने का अज़ाब तो नहीं किया,
कहीं फिर हमें भुलाने का ख्वाब तो नहीं किया,

आईने में से इक अजनबी सा शख्स झाँकता है,
कहीं अक्स से भी ग़ैर सा खिताब तो नहीं किया,

जो दूर निकल गया कहीं साया साथ छोड़ कर ,
वज़ूद से ही हमसफ़र ने हिज़ाब तो नहीं किया,

महक रही है जो फ़िज़ां डूबता सूरज देख कर,
रुखसार को हया से सुर्ख गुलाब तो नहीं किया,

दौड़ता फिरता है जो रगों में बेतहाशा जोर से,
शोखियों ने खूं-ए-दिल को बेताब तो नहीं किया,

हवस की हवाएं टकरा गयीं खामोश जिस्म से,
बेबसी ने पर हाज़िर कोई जवाब तो नहीं किया,

‘दक्ष’ कुछ तक़दीर के फैसले भी शामिल रहे,
वरना तन्हाइयों का ही इंतिखाब तो नहीं किया,

विकास शर्मा ‘दक्ष’

अज़ाब = दर्द देने को यातना ; अक्स = प्रतिबिंब ; खिताब = संबोधन ; हिजाब = पर्दा ; फिजां = वातावरण ; रुखसार = गाल ; ह्या = लज्जा ; सुर्ख = लाल ; इंतिखाब = चुनाव

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