तनहा हो गयी माँ

खुद ही मिट गयी तू, अपनी कोख उजाड़ कर
तनहा हो गयी माँ, तू मुझे मारकर
आँखे खोलती, सबसे पहले तुझे देखती
होठ हिलते तो, मीठी–मीठी बोलती
बगिया की महक, पंछियों का कलरव हो जाती
दरवाजे के पीछे छुप कर माँ, मैं तुझे बुलातीं
अब किसे ढूंढेगी, तू आँखे फाड़कर
तनहा हो गयी माँ, तू मुझे मारकर
तेरे सपनों की अनुपम कहानी होती
तेरी बिटिया रानी, नटखट महारानी होती
दौड़ती-उड़ती ख्वाब ओ ख्यालों की तरह
तेरी जिंदगी मुकम्मल जिंदगानी होती
अब किसे चूमेगी, तू आँखों में काजल डालकर
तनहा हो गयी माँ, तू मुझे मारकर
बिटिया के आंसुओं से, तू अब कैसे नहाएगी
डोली में माँ, तू किसको बिठाएगी
चाँद और सूरज तो तेरा बेटा हो जायेगा
पर तेरी पीठ मेरी माँ, अब कौन सहलाएगा
किसे पुकारेंगे लोग, तेरी सी जानकर
तनहा हो गयी माँ, तू मुझे मारकर

डॉ बजरंग सोनी
जयपुर (राजस्थान)

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Competition Name: साहित्यपीडिया काव्य प्रतियोगिता- "माँ"

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