तनहाई

क्यूँ समझती है तेरे बिन यहाँ तनहाई नही है।
बिस्तर तो है मखमल का, मगर चारपाई नही है ।

कभी अपने आप से सवालात किया करता हूँ ।
कभी तेरी तसवीर से ये बात किया करता हूँ ।
है कौन सी वो दास्ताँ ,जो तुझे सुनाई नही है ।
बिस्तर तो है मखमल का, मगर चारपाई नही है ।

मुरझाए दो फूल हैं ,खिलें तो कैसे खिलें ।
मै यहाँ हूँ तू वहाँ है मिले तो कैसे मिले ।
आँगन की इस धूप में तेरी परछाँई नही है ।
बिस्तर तो है मखमल का, मगर चारपाई नही है ।

मेरे गाँव की वो बाग, जिसमें कोयल कोई गाती थी
आम का वो पेड जहाँ तू झूला झूलने आती थी ।
शहर में वो बाग और अमराई नही है
बिस्तर तो है मखमल का, मगर चारपाई नही है ।

…….मुकेश पाण्डेय

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