कविता · Reading time: 1 minute

*डार्लिंग*

डार्लिंग इससे तो हम
कुंवारे ही अच्छे थे
कम से कम तुम्हें
देखकर
आहे तो
भर लिया करते थे
जब से तुम्हे
बाहों में भरा है
न जाने
मिली है
मुझे
कौन सी सजा है
क्या
शादीशुदा
जिंदगी का
यही मजा है
न जाने
मिल रही
मझे
किस जुल्म
की सजा है
क्या किसी को
देखना भी
गुनाह है ।।
मधुप बैरागी

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