कविता · Reading time: 1 minute

डर

वर्दी वाले आठ मर गये,
रोष यही मुझको भी है,
गद्दारी अपनों ने ही की,
चिंता यही हमें भी है।
अब तो डर लगता है हमको,
तुम पर विश्वास करूँ कैसे?
बस अब इतनी सी चिंता है,
किस पर कैसे मैं आस करूँ?

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