गज़ल/गीतिका · Reading time: 1 minute

डर

ना जाने हमें क्यों डर लगता है ,
नहीं जानते किस बात का डर है ?

हर आहट से चौंक जाते हैं हम ,
जैसे कोई तो मौजूद होता है ।

ना होकर भी कोई तो जरूर है ,
इस ख्याल से दिल कांप जाता है।

अक्स क्या क्या आंखो में तैरते है,
मगर साफ कुछ नजर नहीं आता है ।

यूं लगे जैसे अभी किसी ने पुकारा हो ,
लेकिन सुनने का होंसला नहीं होता है ।

कौन हो सकता है वो ,क्या चाहता है ?
पूछने पर जवाब कैसे मिल सकता है ।

साए भी भला जवाब दे सकते है क्या ?
खामोशी ही जिनका अंदाज होता है ।

वैसे तो हमें तन्हाई बहुत पसंद है मगर,
इसी तन्हाई से हमें क्यों डर लगता है ।

ता उम्र अपने किसी डर को जीत न पाए ,
उनमें तन्हाई का डर सबसे खास होता है ।

अंधेरों से तो हम सबसे जायदा डरने लगे है ,
चूंकि तन्हा इंसा को अंधेरा जकड़ लेता है ।

अब क्या कहें मौजूदा दौर का असर है शायद,
जिंदगी को अब अपने साए से ही डर लगता है।

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