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डर लगता है

विनोद कुमार दवे

विनोद कुमार दवे

गज़ल/गीतिका

October 10, 2016

डर लगता है इन रातों से, इन रातों से डर लगता है,
कब कौन कहाँ कैसे होगा, इन बातों से डर लगता है।

पलकों के सपनो को अपने अश्कों में बह जाने दो, इन सौंधी सौंधी आँखों के ख़्वाबों से डर लगता है।

वो शख़्स अभी जो गुजरा है, उसके पाँवों में अंगारे थे,
कैसे चलता जाऊ मैं, इन राहों से डर लगता है।

वो यार मुझे तो कहता है, और दिल की बातें छुपा के रखता,
तेरे दिल में दबे दबे उन राज़ो से डर लगता है।

‘दवे’ दीवानों की दुनिया में कैसे नफ़रत ज़िंदा है,
नफ़रत की ज्वाला उगल रही उन आँखों से डर लगता है।

पल पल रूप बदलती दुनिया, लोगो के कितने चेहरे है,
खंजर से और लोग डरे, मुझे मीठी बातों से डर लगता है।

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Author
विनोद कुमार दवे
परिचय - जन्म: १४ नवम्बर १९९० शिक्षा= स्नातकोत्तर (भौतिक विज्ञान एवम् हिंदी), नेट, बी.एड. साहित्य जगत में नव प्रवेश। पत्र पत्रिकाओं में रचनाएं प्रकाशित।अंतर्जाल पर विभिन्न वेब पत्रिकाओं पर निरन्तर सक्रिय। 4 साझा संकलन प्रकाशित एवं 17 साझा संकलन प्रकाशन... Read more
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