डरता बचपन?

सहम जाता हूँ माँ जब “आँचल” से तेरे दूर होता हूं..
एक रूह सी काप उठती दिल मे जब आँखों से तेरे ओझल होता हूँ…

अपने दिल की धडकनों को दबायें,घबराहट को छुपाये..तेरी मुस्कुराहट संग मुस्कुराता हूं.. पर सच तो ये है “माँ”मै अब सहम सा जाता हूँ…

यूं तो मेरे स्कूल बस के ड्राइवर,कंडक्टर अंकल मुझे बहुत लाड लगाते है…
समय पर स्कूल,स्कूल से घर पहुंचा जाते है…

भुख लगे जो मुझको तो बिना बोले समझ जाते है..
“माँ”मेरी पसंद के चाकलेट बिस्किट प्यार से मुझे खिलाते है…

समझ नही पाता माँ मै इन्होंने ऐसा काम किया..
हँसते खेलते बचपन को कैसे एकदम से यूं शान्त किया..

एक सिरहन सी होतीं तन मे मै कैसे इन पर अब विस्वास करू..
सहम जाता हूं माँ जब तुझसे दूर होता हूं..

अब तो शिक्षा का हर मंदिर शमशान नजर सा आता है..
क्या देखूं भविष्य के सपने.. यहाँ तो आने वाला कल भी नजर नही आता है…

आँखों के आगे अंधियारा सा छा जाता है..सहम जाता हूँ माँ जब तेरा आँचल छूट जाता है…

अब तो आदत बनानी होगी मुझको अपनी प्यास बुझाने की..
डर लगता मुझको बाहर को भी जाने की..

संगी साथी भी डरे हूए है कोई न किसी का साथ है देते..
घर पहुंचे कैसे तैसे यही मन को विस्वास है
देते…।
पढने आऐ है पर पढने मे भी मन न लगे.।सामने खडी टीचर भी अब तो यमराज का दूत लगे…

कैसे कहूँ की बचा लो माँ इस गंदी दुनिया से नही लगता मन मेरा ओछल तेरी छईयाँ से
नही लगता मन मेरा ओछल तेरी छँईया से…

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