डमरू घनाक्षरी

लोगों से सुना है कि ,इस प्रकार की कविता
नर काव्य के रूप में नहीं लिखना चाहिए ।उसका बहुत बड़ा परिणाम भुगतना पड़ता है क्योंकि इस कविता में मात्राओं का पूरी तरह से निषेध रहता है ।यह केवल भगवान के विषय में लिखी जाती है।

कालिया मर्दन
श्री कृष्ण लीला डमरू घनाक्षरी

छनन छनन कर ,नच नच नटवर,
पग पग पलटत फनन फनन पर।
सनन सनन मन ,डरत सखन गन ,
झटपट चटपट खबर परत घर।
कदम पवन सम ,बढ़त अगन वन,
तपक तपक तट, सकल नगर नर।
अकड़त पकड़त जकड़त उमड़त,
जहर क्षरण कर ,क्षण क्षण फन धर।

गुरु सक्सेना नरसिंहपुर( मध्य प्रदेश)

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