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ट्रिपल तलाक कानून : सिर्फ घड़ियाली आंसू

आखिर आज ट्रिपल तलाक विरोधी विधेयक विपक्ष के तमाम विरोध के बावजूद राज्यसभा से भी पास हो गया और अब यह कानून का रूप ले लेगा. इस पर जिस तरह से मीडिया सरकार का गुणगान कर रही है, उससे मैं बेहद विचलित हुआ इसलिए मैं आज ही यह लेख लिखने को बाध्य हुआ. मित्रों, फॉसिस्ट ताकतों की यही तो पहचान है कि उनकी कोई क्लीयर विचारधारा नहीं रहती. वे पचास मुंह से पचास तरह की बातें करते हैं कि अच्छे-अच्छे बुद्धिमानों का भी सिर चकरा जाए. वर्षों से यह कह-कहकर बहुसंख्यक हिंदू समाज को भरमाया गया कि अब तक की सारी सरकारें धर्मनिरपेक्षता के नाम पर मुस्लिमोेंको बढ़ावा देकर हिंदुओं के हितों पर कुठाराघात करती आई हैं. आज जब ये सत्ता में पहुंच गर्इं तो अब उलट यह कहा जा रहा है पिछली सरकारों ने मुसलमानों का शोषण किया. खासकर मुस्लिम महिलाओं के साथ अन्याय हुआ. कथित इन राष्ट्रवादी अर्थात फासिस्टवादी ताकतों ने अन्य दूसरे मुद्दों के साथ भी तो यही छल किया. मसलन, एफडीआई, जीएसटी, महंगाई, लोकपाल आदि कितने-कितने मुद्दे गिनाऊं आपको.
तीन तलाक भी एक ऐसा ही मुद्दा है जिससे बहुसंख्यक हिंदू समाज और मुस्लिम महिलाएं दोनों को ही छला जा रहा है. कितनी भावुकता भरे शब्दों में कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने यह बिल संसद में पेश किया. उनके घड़ियाली आंसू को जरा देखिए-‘‘यह विधेयक मुस्लिम महिलाओं को उनका अधिकार और गरिमा देता है. यह बिल महिलाओं के सम्मान के लिए है जिसके लिए यह सरकार कृत संकल्पित है.’’
ेसरकार ने वस्तुत: मुस्लिम हितैषी होने का चोला ओढ़कर समाज में सिर्फ उत्तेजित वातावरण तैयार कर हिंदू-मुस्लिम धु्रवीकरण का कंडीशनिंग करने के इरादे से इस बिल को पारित किया है. अपने गोदी मीडिया के माध्यम से बहुसंख्यक समाज के मनोमस्तिष्क में यह बात डालने का कुत्सित प्रयास किया है कि जैसे मुसलमानों में हर तरफ-हर वक्त जैसे तलाक…तलाक…तलाक के शब्ददंशों से अपनी महिलाओं को डंसने का ही काम किया जाता हो. मैं मुस्लिम ही क्या, हर कम्युनिटी की महिलाओं के पक्ष में खड़ा हूं लेकिन मीडिया के माध्यम से इस बिल के पास होने को लेकर ऐसा महिमा मंडन किया जा रहा है जैसे मुस्लिम समाज के लिए बहुत कुछ किया जा रहा हो. मैं चूंकि स्वयं हिंदू समाज से हूं तो देख रहा हूं कि किस तरह हिंदू समाज के अंदर मुस्लिम समाज के प्रति नकारात्मक नजरिया बन रहा है और उनके मन में यह सोच बन रही है कि जैसे खुद उनके अंदर कोई कुरीतियां ही न हों. वस्तुत: कड़वी सच्चाई यह है कि हिंदू समाज में लाखों की संख्या में परित्यक्ता महिलाएं हैं जिन्हें बिना तलाक दिए, मात्र अश्लील गालियां देकर घर से धक्के मारकर भगा दिया गया है. वे बेचारे अपने भाई-भौजाइयों और समाज के लांछन झेलकर अपना जीवन व्यतीत कर रही हैं.
सबसे बड़ी बात तो यह बिल कानून का एक भद्दा उदाहरण है जो संविधान की मूल भावना के ही खिलाफ है क्योंकि यह धर्म के आधार पर पक्षपात करता है. आप कहेंगे कि वह कैसे? तो इसका सीधा सा जवाब है, ‘यह उस आधार पर पक्षपात करता है जैसे कि अगर एक मुस्लिम व्यक्ति अपनी पत्नी को खास तरह से तलाक देता है तो उसे जेल होगी. लेकिन, अगर किसी दूसरे धर्म का शख्स अपनी पत्नी को छोड़ता है तो उसके खिलाफ कोई कानूनी कार्रवाई नहीं की जाएगी.’
इससे भी बड़ी बात तो सुप्रीम कोर्ट ने वैसे भी ट्रिपल तलाक को गैरसंवैधानिक घोषित कर ही दिया था, तब इस तरह के बाहियात कानून बनाने की क्या जरूरत थी. स्पष्ट रूप से इस कानून में कई खामियां हैं. कई मुस्लिम संप्रदायों में तलाक शब्द तीन बार बोलने को एक ही तलाक के रूप में समझा जाता है. लेकिन, इस विधेयक में किसी भी संप्रदाय के शख्स को अपराधी घोषित कर दिया जाएगा, भले ही उसका विश्वास हो कि अभी अखंडनीय तलाक नहीं हुआ है. विपक्ष ने इसका पुरजोर विरोध इसलिए किया कि इसमें सबसे बड़ी गलती एक बार में तीन तलाक बोलने को अपराध घोषित किया गया है और ऐसा करने पर तीन साल के कैद का प्रावधान है.
विपक्ष की ओर से कुछ आपत्तियां हैं.
मसलन:
1. पति की गैर-मौजूदगी में महिला की देखभाल कौन करेगा?
2. क्या सरकार को ऐसे समूह का गठन नहीं करना चाहिए जो महिलाओं को वित्तीय सहायता और पेंशन आदि मुहैया कराए?
3. क्या महिला की शिकायत पर पति के जेल जाने के बाद शादी बरकरार रहेगी क्योंकि तलाक तो हुआ नहीं?
4. क्या महिलाओं के अधिकार तलाक के विभिन्न स्वरूपों के मामलों में इस कानून के माध्यम से सुरक्षित रहेंगे? यह वे सवाल हैं जो विधेयक की समीक्षा करने वालों और संसद में विपक्ष ने उठाए हैं. सरकार ने ऐसी ठोस आशंकाओं को शांत करने की कोशिश तो नहीं की बल्कि ज्यादातर हो-हल्ला मचाने की तर्ज पर भावनात्मक अपील ही ज्यादा करती रही. प्रदर्शन ऐसा किया गया कि वे ही मुस्लिम महिलाओं के असली रहनुमा हैं बाकी तो उनका शोषण करनेवाले हैं.
तलाक पर जरा आपा आंकड़े देखिए. यह जानकर पाठकों को आश्चर्य होगा कि 2011 की जनगणना के आधार पर भारत में तलाकशुदा महिलाओं में 68% हिंदू और 23.3% मुस्लिम हैं. मुसलमानों में तलाक का तरीका सिर्फ ट्रिपल तलाक को ही समझ लिया गया है, हालांकि ट्रिपल तलाक से होने वाले तलाक का प्रतिशत बहुत ही कम है. एक आंकड़ा 0.46 प्रतिशत सामने आया है. आप मेरे इस आलेख पर भी विश्वास न करें, आप स्वयं भी 100 मुसलमानों का सर्वे कर पता करें कि कितनी महिलाओं को ट्रिपल तलाक अर्थात एक बार में ही तीन बार तलाक-तलाक-तलाक बोलकर तलाक दिया गया है.
अगर सरकार सचमुच मुस्लिमों की हितैषी है तो उसे सच्चर कमेटी की रिपोर्ट के मुताबिक मुस्लिमों को शिक्षा, व्यवसाय, राजनीति और सरकारी नौकरियों में उनकी आबादी के अनुपात में भागीदारी सुनिश्चित करे. अभी देश की आबादी में 20 प्रतिशत आबादी रखने वाला मुस्लिम समाज देश के शासन-प्रशासन में मात्र 1.7 प्रतिशत भागीदारी रखता है, कभी भाजपा-संघ एंड कंपनी मुस्लिमों की इस दशा पर चिंता जताती है. अगर सरकार उन्हें सभी क्षेत्रों में भागीदारी सुनिश्चित नहीं करती तो मैं इस तीन तलाक प्रतिबंधक कानून को सिफ घड़ियाली आंसू ही समझूंगा.
– 31 जुलाई 2019

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