Aug 22, 2020 · कविता
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टर टर टर टर , करते दादुर!

●टर टर टर टर
करते दादुर।
शायद हमसे
कुछ कहते दादुर।

•कहते धरा पर
हम भी हैं,
है अस्तित्व
हमारा भी
भूल न जाओ
मानव तुम हमको
यह बतलाने रहते
वो आतुर
टर टर टर टर
करते दादुर।

•वो कहते सुनो
हमारी ध्वनि,
है मधुर संगीत
हमारा भी,
राग भी है
और ताल भी है
अपने को मानव
शूरमा न समझो
हम भी हैं
पाताल के ठाकुर
टर टर टर टर
करते दादुर।

•तुम हमको मेंढक
है कहते, जीवनसंगिनी
को मेंढकी कहते
तुम हों आडम्बरी
अन्धविश्वासी
वर्षा न हो,
हमारा व्याह रचाते
ज्यादा हो तो
तलाक कराते
तुम से हम जीव
ही अच्छे
अपना करते ,
अपना खाते
और कहलाते
बहादुर
टर टर टर टर
करते दादुर।

•कहते ‘दीप’
तुम ‘तम’
को हरते
अपने
प्रकाश से
उजियारा
हम भी तो
मानव जाति हेतु
जल और थल
दोनों में रहते
खाते जीव
जंतुओं की
जैव विविधिता
करते संतुलित
और कहलाते
फिर बहादुर।
टर टर टर टर
करते दादुर।

-जारी
©कुल’दीप’ मिश्रा

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Kuldeep mishra
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