झूठ बिके झटपट ?

पथ पर चलना सत्य के, कभी नहीं आसान l
झूठ बिके झटपट यहां, सच की बंद दुकान ll
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रखो नहीं दिल में कभी, मित्र किसी की बात l
हर रिश्ते की एक दिन, खुलती है औकात ll
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मैं मैं करते हैं सदा, गिरा नयन का नीर l
अपनों की समझे नहीं, अब तो अपने पीर l
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मिट्टी के हम सब बने,मिट्टी ही पहचान l
चार दिनों का खेल यह, खेल रहा इंसान ll
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