झलक।

एक ऐसी शख़्स थीं जीवन में,
जो अक्सर नज़र आ जाती थीं,

कुछ तो ऐसी बात थी उनमे,
जो एक झलक से ही भा जाती थीं,

ना बात कोई ना मुलाकात कोई,
ना जान कोई ना पहचान कोई,

बस अपनी सी लगने लगी,
राहों में मिली अंजान कोई,

दूर-दूर तक कोई वास्ता नहीं,
उनसे मेरा कोई नाता नहीं,

फिर जाने ये एहसास कैसा,
जो दिल से मेरे जाता नहीं,

लोग तो तमाम दिखते थे मगर,
क्यों उनपे ही नज़र रुक जाती थीं,

उनको देखते ही आँखें मेरी,
इज्ज़त से ख़ुद ही झुक जाती थीं,

यूं ही ग़ुज़रती इन राहों से,
जब भी वो मिल जाती थीं,

निखर जाता था सारा दिन मेरा,
ज़िंदगी फूलों सी खिल जाती थी,

सच था या ग़लतफहमी मेरी,
कि मुझे देख के वो मुस्काती थीं,

अपनों में शामिल थी एक बेगानी,
जो ख़्यालों में रोज़ चली आती थीं ।

कवि- अम्बर श्रीवास्तव

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