झलकारी बाई

    “झलकारी बाई”

झलकारी की झलक देखकर ,
वो बुन्देले भी हाँफ गये……
जब उतरी वो समरभूमि में ,
गौरे भी थर-थर काँप गये ||

जमुना-कोख से पैदा हुई ,
भोजला गाँव में बड़ी हुई |
जब आया संकट, झाँसी पर ,
लक्ष्मी के आगे खड़ी हुई ||

रानी को रण से भेज दिया,
निज बौद्धिक-बल के बूते से |
दुश्मन को धूल चटाई थी ,
अपने पैरों के जूते से ||

समर में थी वो रूकी हुई…
अंग्रेज रोज को डाटा था |
निज अश्व हुआ जब जख्मी तो,
कृपाण से दुश्मन काटा था ||

वो अबला थी ,पर यौद्धा थी ,
और वीरांगना कहलाई |
मनु के वेश में लड़ी वो तब ,
फिर लौट के न वो घर आई ||

रानी झाँसी को बचा गई ,
ऐसी नारी थी झलकारी….
“प्रदीप” कवि का प्रणाम उन्हें
है धन्य झलक की महतारी ||

(डॉ०प्रदीप कुमार “दीप”)

क्या आप अपनी पुस्तक प्रकाशित करवाना चाहते हैं?

साहित्यपीडिया पब्लिशिंग द्वारा अपनी पुस्तक प्रकाशित करवायें सिर्फ ₹ 11,800/- रुपये में, जिसमें शामिल है-

  • 50 लेखक प्रतियाँ
  • बेहतरीन कवर डिज़ाइन
  • उच्च गुणवत्ता की प्रिंटिंग
  • Amazon, Flipkart पर पुस्तक की पूरे भारत में असीमित उपलब्धता
  • कम मूल्य पर लेखक प्रतियाँ मंगवाने की lifetime सुविधा
  • रॉयल्टी का मासिक भुगतान

अधिक जानकारी के लिए इस लिंक पर क्लिक करें- https://publish.sahityapedia.com/pricing

या हमें इस नंबर पर काल या Whatsapp करें- 9618066119

Like Comment 0
Views 548

You must be logged in to post comments.

Login Create Account

Loading comments
Copy link to share