कविता · Reading time: 1 minute

—- झमेला —-

कभी कभी लगता है जैसे
हम न जाने क्यूँ जिए जा रहे हैं
जहर जिंदगी का बस रोज
पिए ही जा रहे हैं !!

दफ़न कर के न जाने
कितने ही अरमानो को रोजाना
बेबसी से खुद पर न जाने
कितने ही जुलम सही जा रहे हैं !!

तकदीर तो बनती है बनाने से
ऐसा न जाने कितने लोगों ने कहा
पर हम तकदीर को बनाने में
न जाने कितने सितम सही जा रहे हैं !!

अजीत कुमार तलवार
मेरठ

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