मुक्तक · Reading time: 1 minute

झनन-झनन वारिस बन

झनन झनन बारिश की बूँद सी , मैं बरस बरसत जाऊँ ।
पैर में बाँध के पाजनियाँ घुघरू ,ठुमक – ठुमकत जाऊँ ।।
दे प्रभो बारिश दे हर बार ऐसी , हो जाए धरा हरी-भरी ।
अंग -अंग सब मेरा भीग जाए, ऐसी में फिर हुलसत जाऊँ ।।

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