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जज़्बा

इंदिरा गुप्ता

इंदिरा गुप्ता

लघु कथा

December 7, 2017

लघु कथा
हरखू हड़बड़ा के उठा।”ओह बड़ी देर हो गई।माँ ई दावा कहि की नहीं, मैं जानता था, ले दावा”मैं कहा लेती हूं बेटा तू क्यों परेशान होता है?
“” देखह काम पर मत चल देना,मैं शाम को दवा लेता आऊं गा।मुनिया मेरा बक्सा उठा दे जरा।””
बक्स ले के हरखू जूते पॉलिश करने के काम पर चल दिया।स्टेशन पर वह प्लेटफॉर्म पर बैठ गया।गाड़ी आने वाली थी।गाड़ी आई तो सब सतर्क हो गए।वोह भी आवाज लगाने लगा, आइये बाबू जी जुटा पालिश कराइये ,बिल्कुल चमका दूंगा।वोह बार बार आवाज लगाता पर लोग दूसरे बड़े आदमियों की तरफ बढ़ जाते। हरखू रुनवासा हो गया।तभी एक उसकी ही उम्र का बच्चा उतरा और उसकी तरफ आया।,”लो मेरे जूते पालिश करो।”” वह उच्च वर्ग का लगता था।उसने एक जूता उतार कर दिया,,,,हरखू बड़े मनोयोग से जल्दी जल्दी हाथ चलाने लगा।अपबी फटी कमीज कीबांहसे चमकाने लगा।वोह बड़ी हसरत से जूते देख रहा था। निगाह बीच बीच मे अपने जूते पर जाती, जो इतने फ़टे थे किबीच से तले का टुकड़ा गायब हो गया था एक जूता कर के उसने दिया अरु दूसरा लिया बच्चे ने पूछा तुम्हारा नाम क्या है?”” हरखू”” मेरा ईशान”” हरखू तेजी से हाथ चलाने लगा।गाड़ी ने सीटी दी,,,,” ईशान जल्दी आवो” ईशान एक 50 का नोट रख कर तेजी से चढ़ कर दरवाजे पर खड़ा हो गया। हकु ने दे ख गाड़ी चलाने लगी है।जल्दी जल्दी कर के उसने काम पूरा किया और जूता हाथ मे ले कर भगा।पर ईशान ने जूता उतार कर उसके पास फेंक दिया चिल्ला कर कहा तुम ले लो।यह तुम्हारे लिए है।मैं और ले लूंगा। हरखू की आंखों में आंसू थे।ईशान की धुंधली पड़ती छवि को देख वो हाथ हिला रहा था। उसने दूसरा जुटा उठा दी से लगा लिया।गाड़ी जा चुकी थी,,,,,,,,,,,,।

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