कविता · Reading time: 1 minute

ज्ञान का आविष्कार

मैं ऐसा क्यों सोचता हूँ,कि
धरा के आगोश में सो जाऊँ?
नश्वर इस ब्रह्मांड से
सदा के लिए खो जाऊँ।
प्रकृति की अद्भुत कृति हूँ
तो अवगुणों की विकृति भी
ना जाने क्यों सोच मेरी
कहती है कि मैं रोता जाऊँ।
मैं ऐसा क्यों सोचता हूँ,कि
धरा के आगोश में सो जाऊँ?
नश्वर इस ब्रह्मांड से
सदा के लिए खो जाऊँ।

अभी पूर्ण करना भी है समस्त
दी है जो तुमने जिम्मेदारी
निर्वाह करना भी है, अवशेष
तुम्हारे कृतियों की पहरेदारी
ज्ञानपुंज से चमका दूँ, मै
जड़-चेतन और दुनिया सारी
क्यों न चराचर इस जग को
सत्य का मार्ग दिखा जाऊँ!
मैं ऐसा क्यों सोचता हूँ,कि
धरा के आगोश में सो जाऊँ?
नश्वर इस ब्रह्मांड से
सदा के लिए खो जाऊँ।

हाँ परेशान हूँ; कुछ कृत्यों से
कुछ अपने व गैरों के दुष्कृत्यों से
नीलगगन के छत्र में बैठकर
ज्ञान की ज्योति जलाना है
प्रेम,सद्भाव और मानवता से
इस जग को महकाना है
क्यों न अगाध-प्रेमभाव की
सेवा में ही तत्पर हो जाऊँ।
मैं ऐसा क्यों सोचता हूँ,कि
धरा के आगोश में सो जाऊँ?
नश्वर इस ब्रह्मांड से
सदा के लिए खो जाऊँ।

कभी-कभी मै विचलित सा हुआ
जीवन के दुष्कर मार्गों पर
कुछ भौतिक अभिलाषाओं पर,तो
कुछ अवरोधित शांति-निदानों पर
मार्ग गूढ़ है पर लक्ष्य सुसज्जित
ज्ञान के उस आविष्कार का
निकला हूँ तो ज्ञान का
छोटा ही दीप जला जाऊँ।
मैं ऐसा क्यों सोचता हूँ,कि
धरा के आगोश में सो जाऊँ?
नश्वर इस ब्रह्मांड से
सदा के लिए खो जाऊँ।

-सुनील कुमार

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