कविता · Reading time: 1 minute

जो सच पूछो तो जीने को फ़क़त इतनी जरुरत है !**************

जो सच पूछो तो जीने को फ़क़त इतनी जरुरत है !**************
रहने को छत, दो जून की रोटी,तन ढकने को हो कपड़ा
हर इंसां को हो कुछ काम निठल्ले पन का न लफड़ा
सुकूँ के चार पल ही आज की पहली जरुरत हैं
यूँ तो लाख ख्वाहिश हैं जो सब ही खूबसूरत हैं
जो सच पूछो तो जीने को फ़क़त इतनी जरुरत है! **************************
बचपन में मिले निज गेह माँ का नेह पितु आशीष,
संस्कारों से सुवासित गुरुजनो की प्रीत पावन हो,
सहोदर हो सुखी पुष्पित पल्ल्वित गृह का प्रांगण हो
दादा और दादी हों सुख से सब ही परिजन हों
सभी मिल के रहें घर में लगें खुशियों की मूरत हैं
जो सच पूछो तो जीने को फ़क़त इतनी जरुरत है!!*************************************
कि है ये चार दिन की ज़िंदगी सौ वर्ष का सामान
मिले दो जून कि रोटी न डिगने पाए ये ईमान
कि बस सम्मान कि रोटी हमें सबसे ही प्यारी है
हकीकत ज़िंदगी कि ये अलग सबसे ही न्यारी है
सरल सबसे सहज दिखती यही ईमान कि सूरत है
जो सच पूछो तो जीने को फ़क़त इतनी जरुरत है !!!*********************************

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