जो रोज़ बड़ों का अपने आशिष पाते हैं

जो रोज़ बड़ों का अपने आशिष पाते हैं।
कांटे उनकी राहों से खुद हट जाते हैं ।

है मान हमें अपनी सभ्यता पर भी जैसे
आओ गुण औेंरों के हम भी अपनाते हैं।

है शौक नहीं हमको ऐसे दिखावे का
जैसे दिल से हैं वैसे ही इतराते हैं।

बातें करने से कोई बदलाव नहीं होगा
आओ मिलजुल कर सारे कदम बड़ाते हैं।।।
कामनी गुप्ता ***

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