जो मेरे साथ था,ज़िन्दगी की तरह,,

जो मेरे साथ था ज़िन्दगी की तरह,
अब वो लगने लगा अजनबी की तरह,

जिस्म जिसका है यारों सरापा ग़ज़ल,
उसका लहजा भी है शायरी की तरह,

उनसे मिलने के आदाब सीखे कोई,
वो जो मिलते नहीं हर किसी की तरह,

हिज्र में मैं भी पागल सा लगने लगा,
वो भी दिखने लगी बावरी की तरह,

——-//अशफ़ाक़ रशीद,

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