गज़ल/गीतिका · Reading time: 1 minute

जो देख रहे है मेरा काँच

जो देख रहे है मेरा कांच का घर
उस मासूम के हाथ में है पत्थर

दोस्ती टूट गई तो हादसा हो गया
अब रह नहीं गया वो मेरा रहबर

बस्तियाँ जला गया मजहब नाम पे
उसकी आँख में नहीं था दर्द का मंजर

वो तो अब बन गया खुद ख़ुदा सब का
लोगों के दिल में बाँटता फिरता डर

मैं परिंदा नदान था भूल गया सरहद
करा कत्ल मेरा और काट डाले मेरे पर

खामोश मन्दिर की घन्टिया कहती है आज
नफरत उगी चारो तरफ खेत नहीं रहे बंजर

मेरे उसके बीच जो धर्म की दीवार खड़ी हुई
अशोक इतिहास बन गया हौसला गया मर

अशोक सपड़ा की कलम से दिल्ली से

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