कविता · Reading time: 1 minute

जो चल रहा है

जो चल रहा है

जो चल रहा है
सो चल रहा है
तम की आग में
गण जल रहा है |

जो छल रहा है
वो पल रहा है
सत पथ हमेशा
अब टल रहा है |

न आज रहा है
ना कल रहा है
नेकी बदी का
ना फल रहा है
जो फल रहा है
वो खल रहा है
हरि ही हार को
इक बल रहा है |

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