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"जोडूँ कैसे"

खुले घूमते दर्द ये मेरे ,
फ़िर भी दिखते नहीं किसी को ,
छू-छूकर के और टटोलें ,
निर्मम हँसी, ये घायल मन को,
चीथडे-चीथडे हुए सभी ,
कागज़ से ये अवगुन्ठन,
तिनका-तिनका जोडू कैसे,
दर्द ढकूं मैं बिना वसन,
खुले बहते निर्झर मेरे ,
फ़िर भी भिगोते नहीं किसी को ,
रह -रहकर देते और हिलोरें,
प्यासे -प्यासे गीले तन को ,
भीगे -भीगे हुए सभी ,
मिट्टी से ये अन्तस,
तार -तार जोडू कैसे,
निर्झर पोछू मैं बिना वसन||
…निधि…

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डा0 निधि श्रीवास्तव
डा0 निधि श्रीवास्तव "सरोद"
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"हूँ सरल ,किंतु सरल नहीं जान लेना मुझको, हूँ एक धारा-अविरल,किंतु रोक लेना मुझको"
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