>>> जैहिंद के दोहे

जैहिंद के दोहे —-

जनता का नेतवन से, कब भंग होइ मोह ।
कब ले सोइहैं जनता, कब लिहैं ठौर-टोह ।।

पूजा, टोना, टोटका, नाहिं काहु सुहाय ।
पूजै झूठे लोगवा, मनवा छनिक भुलाय ।।

काहु नाहिं रे पूछिहैं, _ बिन तोहे सिंगार ।
तू जे सिंगार करिबै, लखिहैं लाख-हजार ।।

बड़ सजैबे कापड़ से, अरु करबे सिंगार ।
एक दिन नंगे जइबै, लिंहैं कापड़ उतार ।।

पगलाय पाई कुरसी, अँखियाँ मूँदी सोय ।
भाँड़ में गइलैं जनता, मंतरी चाँदी होय ।।

जीवन-मरन दुइ जग में, जीवन के हैं सार ।
इंतकाल जे होइहैं, ____ लगिहैं कांधे चार ।।

भज प्यारे श्रीराम तू, __ ले तनिक गति सुधार ।
बनके सज्जन क्षण भर, कर ले तनिक विचार ।।

भेद…ना जानत मनुवा, __ भगवन…अभेद होय ।
लौकिक जानत लोगवा, अलौकिक नाहिं कोय ।।

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दिनेश एल० “जैहिंद”
03. 10. 2017

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