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जूते भी सिलता है बचपन

सदानन्द कुमार

सदानन्द कुमार

कविता

May 18, 2017

ठण्डी पटकन पर ठहरा बचपन
शहर चौराहे बैठा बचपन

पूछे ,, जूते चमका दू क्या भईया ?

क्या जूते भी सिलता है बचपन ?

तनिक रूक कर मन सुस्त हुआ
पूछा फिर मैने
क्या नाम है बाबू ?
बेबाकी से बचपन बोला
‘ भूरा ‘ नाम है हमरा भईया

और
ऊपर की जेब मे रखी थी उसने
पालिश की एक पिचकी सी डिब्बी
मन चमकता उजला सा है
और
हाथो पर अनगिनत जूतो की जिभ्भी

पुष्प सरीखे नन्हे हाथो पर ,, नृशंस जीवन के शूल चूभे है
कई गहरे चोट बचपन के देह पर
निर्मम जीवन के भूल छिपे है

पास ही बैठी थी बचपन की अबोध सहोदरा
खेल रही थी
और खिलौने थे उसके ,, वो ही कुछ पालिश की डिब्बी

मै भी बैठा कि खेल कर देखू
बैठते ही बचपन ने टोका

तुम्हारे कपड़े गंदे होते है भईया

मेरा भी संवाद बचपन से
तुम्हारे कपड़े क्यो कभी गंदे नही होते ?

बचपन का वो सयाना प्रशनोत्तर

मेरे फटे लबादे से सुंदर झिंगोले की तुलना क्यो करते हो
पालिश तो दस रूपये की मैने की है
पचास रूपये तुम क्यो देते हो

क्या बोलू बचपन से
क्षण भर को तो मै मौन हुआ

स्वाभिमान की नन्ही झांकी
झलक दिखी तो मैने बोला

महँगे जूतो पर मेहनत की पालिश
सो पचास रूपये देता हू

नन्ही अनुजा
खिलौने मुझसे बांट रही थी
अबोध बोली से जाने क्या गांठ रही थी

दो पन्नो पर
अनुजा हाथो की छापे लेकर
मैने पूछा
रख लू क्या मै ये छापे

छाप नही है ये
ये रूपया है

हंसते हंसते बोला बचपन
रख लो भईया
ये छोटकी नही है
ये भी फूटी चूकिया है

ओझल हो कर उन बचपन नयनो से
निहारता रहा मै
बचपन का कर्मोत्सव

क्या ज्ञान बघारू बचपन को
समझाऊ क्या ??
काॅपी कलम की बात
रोटी की भयावह ज्वाला से
कब जलती है शिक्षित लौ की आग

क्षण भर की विपत्ति भोग कर
जो लिखते पढते अवसाद ही है
उनको इस बचपन के जीवठ से मिलकर

मिलना जैसे अमृत होगा

और वही प्रशन सूनता हू फिर मै
जूते चमका दू क्या भईया

और वही
शहर चौराहे बैठा बचपन
ठण्डी पटकन पर ठहरा बचपन

क्या जूते भी सिलता है बचपन ??

सदानन्द
18 मई 2017

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Author
सदानन्द कुमार
मै सदानन्द, समस्तीपुर बिहार से रूचिवश, संग्रहणीय साहित्य का दास हूँ यदि हल्का लगूं तो अनुज समझ कर क्षमा करे Whts app 9534730777

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