जूते की अभिलाषा

पढ़िए पैरोडी

शीर्षक – #जूते_की_अभिलाषा

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चाह नहीं, चरनन देवों की,
बन, चरण-पादुका तर जाऊँ।
विश्व-सुंदरी के गहनों में,
मैं सजूँ, भाग्य फिर इतराऊँ।।
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चाह नहि जनता को लूटने,
सत्ता, गद्दी पर चढ़ जाऊँ।
चाह नहि नेताओं संग मैं,
घोटाला कोई कर जाऊँ।।
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नहीं सोच है बनूँ धरम मैं,
धोखा बन सब मन भर जाऊँ।
या अपनों का तोड़ भरोसा,
फिर, खंड-खंडकर बंट जाऊँ।।
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नहीं राजा का महल सुहाय।
कुटिया अब मन को नहीं भाय।
बहुत चला कंटक कष्टों में,
राह गलत अब चली नहि जाय।।
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नहि मैं कोई रुतबा चाहूँ,
नहीं चाहूँ कोई सरकार।
मैं जूता मेरी अभिलाषा,
मैं चाहूँ बस एक उपकार।।
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मुझे बना लेना तू #मोची,
उन सब सरों पर देना मार।
मातृभूमि पर लूट करें जो,
और दीनों पर अत्याचार।।
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संतोष बरमैया #जय

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