जुगनुओं के खेत में

जुगनुओं के खेत में (मुक्तक)
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साँझ होते देख हलचल उस चमकती रेत में,
कुछ लगा हमको अलग सा उस नवल संकेत में,
जब सुना हमने उजाला बँट रहा है मुफ्त तो,
चल पड़े हम भी उसी पल जुगनुओं के खेत में ।
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हरीश लोहुमी, लखनऊ (उ॰प्र॰)
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कविता क्या होती है, नहीं जानता हूँ । कुछ लिखने की चेष्टा करता हूँ तो...
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