गज़ल/गीतिका · Reading time: 2 minutes

मेरे बिछड़े जीवन साथी

संसार सागर के मझधार में छोड़ गए तुम ,
ये जीवन सफर भी अधूरा छोड़ गए तुम ,

जो सपने मिलकर देखे थे कभी हमने तुमने,
उन सपनो को भी अधूरा क्यों छोड़ गए तुम ।

माना अति व्यस्तता से समय कम होता था,
मगर शाम की चाय हमारे साथ पीते थे तुम।

अब हम हैं और हमारे साथ बेहिसाब तन्हाई है ,
ऐसी तन्हाई में बहुत अधिक याद आते हो तुम!

तुम्हारी किताबे ,कलम और अन्य सारा समान ,
मात्र स्पर्श करते ही ख्यालों में उभर आते हो तुम।

तुम्हारे बसाए गए गुलशन में बड़ी रौनक आई है,
मगर इनका आनंद लेने को साथ नहीं हो ना तुम।

बच्चे कहते है की जाओ थोड़ा बाहर घूम आओ,
क्या अकेले गुमसुम से कमरे में बैठे रहते हो तुम ।

उनका कहा मान हम बाहर चले भी जाते है मगर,
छेड़े जब कोई तुम्हारा जिक्र भी ..जानते हो ना तुम।

बड़ा मुश्किल होता है दिल को पल पल बहलाना ,
कैसे भूल जाए हमारे जीवन का आधार थे तुम ।

दिल में जो बसा हो उसे तो भुलाया जा सकता है ,
मगर हमारे हर सांस में, हमारी रूह में बसे हो तुम।

अब तन्हा ही जीवन का शेष सफर तय करना होगा,
तुम्हारी यादों के सहारे ,ये सौगात छोड़ गए हो तुम।

मगर प्रिय!तुम्हें मुझसे एक वायदा तो करना ही होगा ,
हमारी अंतिम घड़ी में हमें दर्शन अवश्य दोगे ना तुम ।

हमारे हाथों में देकर अपना हाथ संग अपने ले जाना,
इहलोक तजकर सदा के लिए एक हो जायेंगे हम तुम।

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