घनाक्षरी · Reading time: 1 minute

जीवन संगिनी (मनहरण घनाक्षरी छंद)

👲👲👲 जीवन^संगिनी 🙍🙍🙍
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मम जीवन संगिनी, कलत्र अंग अंगनी।
खुशियों के संग प्रिय, अंग में विराजती।।
साजती सवारती है,जिन्दगी निखारती है।
प्रेम रस घोल प्रिय, हमको पुकारती।।

आलय देवालय सा, जीवन विद्यालय सा।
कठिन प्रयास कर, हमको सुधारती।।
दुर्गुण का नाश कर, जीवन सुधार कर।
नियति से लड़ती ये, विपदा बुहारती।।

बहु दुख सहती है, आह नहीं भरती है।
रहती मलंग मस्त, प्रेम नेह बांटती।।
जीवन में आई जब, हर्ष संग लाई तब।
दुख के दरार सारे, खुद से ही पाटती।।

संसती प्रदायिनी तू, वैभव विधायिनी तू।
कुल का तू ध्यान रख, पूरखों को तारती।।
धर्म का विधान कर,वेदना का नाश कर।
हरिप्रिया इन्दिरा सा, निलय निखारती।।

————— स्वरचित, स्वप्रमाणित
✍️पं.संजीव शुक्ल “सचिन”

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