कविता · Reading time: 1 minute

जीवन वह शून्य है

अगर है मोह मंजर उग्र धारा में
मन क्षणिक है और बुद्धि दीन है
मनु जो जन सेवा हीन है
देह वह मृत तुल्य है
जीवन वह शून्य है ।

अमृत वाणी का जहाँ पराग न हो,
ज्ञान ज्योति का जहाँ चिराग न हो
तप तमासाई हो, सेवा का जहाँ विचार न हो
साधु वह भृष्टा तुल्य है
जीवन वह शून्य है ।

धर्म का जहाँ निबाह न हो
नीति का जहाँ प्रवाह न हो
क्षमा लेश न हो, शान्ति का जहाँ प्रवेश न हो
देव वह दैत्य तुल्य है
जीवन वह शून्य है ।

जीवन वह जो निराकार है
सेवा वह जो अपार है
भक्ति वह जो मन हित है
शक्ति वह जो जन हित है
विलासिता जहाँ शून्य है
मनु वह देव तुल्य है ।

देवेन्द्र दहिया – अंबर

2 Likes · 2 Comments · 42 Views
Like
37 Posts · 2.3k Views
You may also like:
Loading...