जीवन लीला

जीवन – लीला रहे अधूरी सुख – दुख के संयोग बिना ..

प्रीति कहाँ हो पाती पूरी कुछ दिन विरह वियोग बिना..

खट्टे – मीठे सभी स्वाद से सजी गृहस्थी की थाली ..

पार कहाँ लगती है नैया आपस के सहयोग बिना ..

Like Comment 0
Views 27

You must be logged in to post comments.

Login Create Account

Loading comments
Copy link to share