जीवन परिचय

हरियाणवी सांगीतकारों का व्यक्तित्व एवं कृतित्व:-

प्रस्तुत पुस्तक हरियाणवी सांगो की एक रचनावली है जिसमे पंडित राजेराम जी के सांगो को सूचीबद्ध किया गया है। इससे पूर्व शंकरलाल यादव, साधुराम शारदा, राजाराम शास्त्री, देवीशंकर प्रभाकर, कृष्णचन्द्र शर्मा, राजेंद्र स्वरूप वत्स, डॉ पूर्णचंद शर्मा, लक्ष्मीनारायण वत्स, डॉ बाबूलाल, डॉ लालचंद गुप्त, डॉ रामपत यादव, बी.ऐ. की पाठ्यक्रम मे संकलित हरियाणवी लोकधारा एवं अन्य अति सहायक पुस्तकों आदि के साहित्य से सहायता लेकर यह वर्गीकरण किया गया है। हरियाणा में संगीतकारों की एक लम्बी परम्परा रही है। यह इतनी विस्तृत प्रणाली है कि यदि इसका समुचित रूप से वर्णन किया जाए तो कई ग्रन्थों की रचना हो सकती है। अधिकतर ऐसे लोक-कवि एवं सांगी हुए है, जिनका साहित्य अब उपलब्ध नहीं है। हरियाणवी लोक-कवियों में कुछ ऐसे भी जन-कवि हुए है जिन्होंने सांगों को स्वयं मंचन नहीं किया लेकिन उन्होंने सांगों की रचना की है।

लेक-नाट्यकारो का परिचय-

सांग मंचकों एवं लोक कवियों के व्यक्तित्व एवं कृतित्व का उल्लेख करना समीचीन/उचित जान पड़ता है। हरियाणा भूमि के कुछ प्रख्यात व उपलब्ध प्रतिष्ठ लोक सांगीतकार इस प्रकार है- सुर्यकवि पं0 लख्मीचंद, श्री बाजे भगत, पं0 नन्दलाल, पं0 रघुनाथ, पं0 हरिकेश पटवारी, पं0 मांगेराम, श्री धनपत सिंह, पं0 चन्द्रलाल भाट उर्फ ‘बेदी’, पं0 रामकिशन व्यास, चौ. मुंशीराम, फौजी मेहर सिंह, पं0 भारतभूषण सांघीवाल, पं0 लहणा सिंह अत्री, डाॅ0 रणबीर दहिया एवं डाॅ0 चतरभुज बंसल आदि। अब मै यहाँ इन कुछ लोककवियों की मुख्य जानकारी पर प्रकाश डालने की कौशिश कर रहा हूँ, और कविराज ने भी अपनी निम्नलिखित पंक्तियों मे हरियाणवी लोक-साहित्य के कवियों का कितना सटीक चित्रण किया है-

दीपचंद, हरदेवा, बाजे, उनका भी घर-गाम देख्या,
फेर चल्या जा सिरसा-जांटी, धोरै जमना धाम देख्या,
लख्मीचंद नौटंकी, मीराबाई का बणाया सांग,
मांगेराम नै शिवजी-गौरा, ब्याही का बणाया सांग,
राजेराम नै भाई, गंगेमाई का बणाया सांग,
पास किया सरकार नै, कविता निराली, कैसी चक्र मै डाली,
खूब रची करतार नै, या दुनिया मतवाली, कैसी चक्र मै डाली।। टेक ।।
(फुटकड़ रचना)

1 सुर्यकवि पं0 लख्मीचन्द :-

हरियाणवी भाषा के प्रसिद्ध कवि व सांग कला की अमर विभूति पंडित लख्मीचंद हरियाणा लोक संस्कृति का अभिन्न अंग है। सांग कला को अनेक महान शख्सियतों ने अपने ज्ञानए कौशल, हुनर और परिश्रम से सींचकर अत्यन्त समृद्ध एवं गौरवशाली बनाया। ऐसी महान शख्सियतों में से एक थेए सूर्यकवि पंडित लख्मीचन्द। उनका जन्म हरियाणा के सोनीपत जिले के गाँव जांटी कलां में पंडित उदमी राम के घर 15 जुलाई, 1903 को हुआ.

लख्मीचंद बसै थे जाटी जमना के कंठारै,
नरेले तै तीन कोस सड़के आजम के सहारै, (प.मांगेरामद-सांग नौरत्न)

उनके दो भाई व तीन बहनें थीं। वे अपने पिता की दूसरी संतान थे। परिवार की आर्थिक स्थिति ठीक न होने के कारण बालक लख्मीचंद पाठशाला न जा सके तथा आजीवन अशिक्षित रहे। सात-आठ वर्ष की बाल्यावस्था में इन्हें पशु चराने का काम सौंपा गया। गायन की ओर इनका रूझान बचपन से था। जब कभी आसपास के गांव में भजन, रागनी अथवा सांग-मंचन का कोई कार्यक्रम होता, वे वहां अवश्य जाते थे। भले ही वे गरीबी एवं शिक्षा संसाधनों के अभावों के बीच स्कूल नहीं जा सके, लेकिन ज्ञान के मामले में वे पढ़े-लिखे लोगों को भी मात देते थे। उन्होंने अपने एक सांग ‘ताराचन्द’ में अपनी अनपढ़ता का स्पष्ट उल्लेख करते हुए कहा है-

लख्मीचंद नहीं पढ़रया सै, गुरु की दया तै दिल बढ़रया सै,
तेरै बनड़े कैसा रंग चढ़रया सै, रूप म्हारे मन भाग्या,
सच्चे मोतियाँ का जुड़ा हाथ कड़े तै लाग्या।
भली करी थी पनमेशर नै, तूं राजी-ख़ुशी घर आग्या।।

सात आठ वर्ष की उम्र मे ही उन्होंने अपनी मधुर व सुरीली आवाज से लोगो का मन मोह लिया और ग्रामीण उनसे हर रोज भजन व गीत सुनांने की पेशकश करने लगे। फिर कुछ ही समय मे लोग उनकी गायन प्रतिभा व सुरीली आवाज के कायल हो गए। अब उनकी रूचि सांग सिखने की हो गई थी। उसके बाद दस-बारह वर्ष की अल्पायु में ही बालक लख्मीचंद ने बसौदी निवासी श्री मानसिंह जो कि अंधे थे, उनके भजन कार्यक्रम से प्रभावित होकर उनको ही अपना गुरू मान लिया। सांग की कला सीखने के लिए लख्मीचन्द कुण्डल निवासी सोहन लाल के बेड़े में शामिल हो गए। अडिग लगन व मेहनत के बल पर पाँच साल में ही उन्होंने सांग की बारीकियाँ सीख लीं। उनके अभिनय एवं नाच का जादू लोगों के सिर चढक़र बोलने लगा। उनके अंग अंग का मटकना, मनोहारी अदाएं, हाथों की मुद्राएं, कमर की लचक और गजब की फूर्ती का जादू हर किसी को मदहोश कर डालता था। जब वे नारी पात्र अभिनीत करते थे तो देखने वाले बस देखते रह जाते थे। इसी बीच फिर एक दिन सोहनलाल सांगी ने लख्मीचन्द के गुरु पंडित मानसिंह सूरदास के बारे में कुछ असभ्य बात मंच पे कहदी तो लख्मीचन्द गुरु भक्ति के कारण इस कटु वचन को सह न सके और उन्होंने सोहन लाल का बेड़ा छोडऩे का ऐलान कर दिया। इससे बाद कुछ संकीर्ण मानसिकता के लोगों ने धोखे से लख्मीचन्द के खाने में पारा मिला दिया, जिससे लखमीचन्द का स्वास्थ्य खराब हो गया। उनकी आवाज को भी भारी क्षति पहुंची। लेकिनए सतत साधना के जरिए लख्मीचन्द ने कुछ समय बाद पुनः अपनी आवाज मे सुधार किया और उसके बाद उन्होंने स्वयं अपना बेड़ा तैयार करने का मन बना लिया। फिर पंडित लख्मीचंद ने अपने गुरु भाई जैलाल उर्फ़ जैली नदीपुर माजरावाले के साथ मिलकर मात्र 18-19 वर्ष की उम्र में ही अलग बेड़ा बनाया और सांग मंचित करने शुरू कर दिए। अपनी बहुमुखी प्रतिभा और बुलन्द हौंसलों के बल पर उन्होंने एक वर्ष के अन्दर ही लोगों के बीच पुनः अपनी पकड़ बना ली। फिर उनकी लोकप्रियता को देखते हुए बड़े-बड़े धुरन्धर कलाकार उनके बेड़े मे शामिल होने लगे। सांग के दौरान साज-आवाज-अंदाज आदि किसी भी मामले मे किसी भी तरह की लापरवाही लख्मीचंद को पसंद नहीं थी। उन्होंने अपने बेड़े मे एक से एक बढ़कर कलाकार रखे और सांग कला को नई ऐतिहासिक बुलन्दियों पर पहुंचाया। अब यहाँ ऐतिहासिक सांग ‘नल-दमयंती’ के अन्दर से उनकी एक बहुचर्चित सहज रचना इस प्रकार पेश है कि-

छोड चलो हर भली करैंगे, कती ना डरणा चाहिए,
एक साड़ी मै गात उघाड़ा, इब के करणा चाहिए ।। टेक ।।

गात उघाड़ा कंगलेपण मै, न्यूं कित जाया जागा,
नग्न शरीर मनुष्य की स्याहमी, नही लिखाया जागा,
या रंगमहलां के रहणे आळी, ना दुख ठाया जागा,
इसके रहते मेरे तै ना, खाया-कमाया जागा,
किसे नै आच्छी-भुंडी तकदी तो, जी तैं भी मरणा चाहिए ।।

फूक दई कलयुग नै बुद्धि, न्यूं आत्मा काली होगी,
कदे राज करूं था आज पुष्कर के, हाथं मै ताली होगी,
सोलह वर्ष तक मां-बापां नै, आप सम्भाली होगी,
इब तै पतिभर्ता आपणे धर्म की, आप रूखाली होगी,
खता मेरी पर राणी नै भी, क्यों दुख भरणा चाहिए ।।

एक मन तै कहै छोड़ बहू नै, एक था नाटण खातर,
कलयुग जोर जमावै भूप पै, न्यारे पाटण खातर,
बुद्धि भ्रष्ट करी राजा नल की, न्यूं दिल डांटण खातर,
एक तेगा भी धरणा चाहिए, साड़ी काटण खातर,
फेर न्यूं सोची थी कलयुग नै, एक तेगा धरणा चाहिए ।।

राणी साझैं पड़कै सोगी, राजा रात्यूं जाग्या,
उसी कुटी मै इधर-उधर, टहल कै देखण लाग्या,
राजा नल नै खबर पटी ना, भूल मै धौखा खाग्या,
फिर कलयुग तेगा बणकै, भूप नै धरा कूण मै पाग्या,
लख्मीचन्द दिल डाटण खातिर, सतगुर का शरणा चाहिए ।।

पं0 लख्मीचन्द ने हरियाणवी सांग को नया मोड़ दिया। उनकी प्रतिभा से प्रभावित होकर श्री रामनारायण अग्रवाल ने ‘सांगीतः एक लोक-नाट्य परम्परा’ नामक ग्रंथ में स्पष्ट किया है- ‘‘इन सब सांगियों में लख्मीचंद सर्वाधिक प्रतिभावान थे। रागनी के वर्तमान रूप के जन्मदाता वास्तव में लख्मीचंद है। कबीर की भांति लोक भाषा में वेदान्त तथा यौवन और प्रेम के मार्मिक चित्रण में लख्मीचंद बेजोड थे। इन जैसा लोक जीवन का चितेरा सांगी हरियाणे में दूसरा नहीं हुआ। पं0 लख्मीचंद के बारे में उनके शिष्य पं0 मांगेराम ने ‘खाण्डेराव परी’ नामक सांग में इस प्रकार कहा-

लख्मीचंद केसा दुनियां म्हं, कोई गावणियां ना था।
बीस साल तक सांग करया, वो मुंह बावणियां ना था।
वो सत का सांग करया करता, शर्मावणिया ना था।
साची बात कहणे तै, कदै घबरावणियां ना था।

इस प्रकार हरियाणवी सांग को तपाकर कुन्दन बनाने वाले सूर्यकवि पंडित लख्मीचन्द एक लंबी बीमारी के उपरान्त 17 जुलाई, 1945(17 अक्तूबर, 1945) की सुबह इस नश्वर संसार को छोडक़र परमपिता परमात्मा के चरणों में जा विराजे और वे अपनी अथाह एवं अनमोल विरासत छोडक़र चले गए। महान् सांगीतकार पं0 लख्मीचंद को सामाजिक, सांस्कृतिक एवं धार्मिक पक्षों का व्यावहारिक ज्ञान था। उनके सांगीतों में सामाजिक रिश्तों का चित्रण सांस्कृतिक मूल्यों व आदर्शाें के अनुरूप ही हुआ है। ‘सत्यवान सावित्री’ नामक सांगीत में माता-पिता अपनी पुत्री सावित्री के जवान होने पर उसके विवाह की चिन्ता करते है। राजा अश्वपति जवान पुत्री को अविवाहित देखकर चिन्तित है-

अपनी जवान पुत्री नै देख, सोचण लाग्या जतन अनेक,
मिटते कोन्या लेख करम के, न्यूं ऊँच नीच का ध्यान किया,

सावित्री की माता भी चिन्ताग्रस्त होकर क्या कहती है-

सावित्री का भी कुछ ध्यान सै, सुण साजन मेरे होरी ब्याहवण जोग।

बात कहूं सूं बणके टेढी, मनै तै एक जणी थी बेटी,
जिनकै बेटी घरां जवान सै, न्यू कहते बड़े बड़ेरे, उनकै माणस मरे जितना सोग।

उनकी इस विरासत को सहेजने व आगे बढ़ाने के लिए उनके सुपुत्र पंडित तुलेराम कौशिक ने उल्लेखनीय भूमिका निभाई। इसके बाद तीसरी पीढ़ी में उनके पौत्र पंडित विष्णुदत्त कौशिक भी अपने दादा की परंपरा का हरियाणा, राजस्थान व उत्तर प्रदेश के दूर-दराज के गाँवों तक प्रचार प्रसार कर रहें हैं तथा अपनी विरासत के संरक्षण एवं संवर्धन में अति प्रशंसनीय भूमिका अदा कर रहे हैं। वे अपने दादा द्वारा बनाए गए ‘ताराचंद’ के तीन भाग, शाही लकड़हारा के दो भाग, पूर्णमल, सरदार चापसिंह, नौटंकी, मीराबाई, राजा नल, सत्यवान-सावित्री, महाभारत का किस्सा, कीचक वध, द्रोपदी चीरहरण, पद्मावत, आदि दर्जन भर साँगों का सैंकड़ो बार मंचन कर चुके हैं और आज भी लोगों की भारी भीड़ उन्हें सुनने के लिए दौड़ी चली आती है। हरियाणवी लोक संस्कृति की महान शख्सियत सूर्यकवि पंडित लख्मीचन्द को कोटि-कोटि नमन है।

पंडित लखमीचन्द के शिष्यों की बहुत लंबी सूची है, जिन्होंने सांग कला को समर्पित भाव से आगे बढ़ाया। उनके शिष्य पंडित मांगेराम (पाणछी) ने अपनी बहुमुखी प्रतिभा के बल पर सांग को एक नया आयाम दिया और अपने गुरु पंडित लख्मीचन्द के बाद दूसरे स्थान पर सांग कला में अपना नाम दर्ज करवाया। उनके शिष्यों ने अपने गुरु पंडित लख्मीचंद का नाम खूब रोशन किया जिनकी सूची इस प्रकार है, जो रागनी, भजन गाने या बनाने में निपुण थे।

क्र. शिष्य के नाम निवास स्थान
1 पंडित रामचन्द्र खटकड़
2 पंडित रतीराम हीरापुर (श्री लख्मीचंद के मामा के लड़के)
3 पंडित माईचन्द बबैल
4 पंडित सुल्तान रोहद
5 पंडित चंदनलाल बजाणा
6 पंडित मांगेराम पाँणछी
7 फौजी मेहरसिंह बरोणा
8 पंडित रामस्वरूप स्टावली
9 पंडित ब्रह्मा शाहपुर बड़ौली
10 श्री धारासिंह बड़ौत
11 श्री धर्मे जोगी डीकाणा
12 श्री जहूरमीर बाकनेर
13 श्री सरूप बहादुरगढ़
14 श्री तुंगल बहदुगढ़
15 श्री हरबंश पथरपुर-उ.प.
16 श्री लखी धनौरा-उ.प.
17 श्री मित्रसेन लुहारी-उ.प.
18 श्री चन्दगीराम अटेरणा
19 श्री मुंशीराम मिरासी खेवड़ा (बाद मे पाकिस्तान स्थानांतरित)
20 श्री गुलाब रसूल पिपली खेड़ा (बाद मे पाकिस्तान स्थानांतरित)
21 श्री हैदर नया बांस (बाद मे पाकिस्तान स्थानांतरित)

’ पं लख्मीचन्द के सगे भाई दीपा एवं शिष्य व सगे मामा के लड़के पं रतिराम सांगी एक ही घर में सुराणा-उ.प. में सगी बहनों से विवाहित थे।
’ सुपुत्र स्व. पं तुलेराम सांगी ने काफी दिनो तक बेड़ा संभाले रखा था।
’ सुपौत्र पं विष्णुदत्त अपने दादा लख्मीचन्द द्वारा बने सांग आज तक भी कर रहे है।

’पं० लख्मीचन्द – संक्षिप्त जानकारी’

जन्म तिथि 15.07.1903
स्वर्गवास 17.10.1945
निवास स्थान जांटीकलां . जिला सोनीपत
सतगुरु का नाम पं मानसिंह सूरदास (गांव बसौदी)
पिता एवं माता पं० उमीदराम एवं रीमती शिबिया
भाईयो का नाम कंगण एवं दीपा
बहनों का नाम छोटो देवी (नांगल में विवाहित)
रत्नो देवी (भूररी में विवाहित)
धन्ता देवी (जेठड़ी में विवाहित)
पत्नी का नाम भरपाई देवी
ससुर का नाम श्री बसतीराम (गांव हसलापुरए गुरूग्राम)
साला का नाम श्रीचन्द
सुपुत्र श्री तुलेराम कौशिक सांगी
सुपौत्र श्री विष्णुदत्त शर्मा सांगी

पं0 लखमीचंद ने लगभग 40 सांगों की रचना की जोकि लगभग निम्नलिखित हैः-

नौटंकी मीराबाई रघुबीर धर्मकौर अंजना देवी
चन्द्रकिरण ऊंखा अनिरूद्ध हीर-रांझा निहालदे नर सुल्तान
राजा भोज सरणदे ध्रुव भगत ज्यानी चोर बीजा सोरठ
चापसिंह सोमवती रूप बसन्त हूर मेनका हीरामल जमाल
शाही लकडहारा सती विपुला सत्यवान-सावित्री शकुन्तला-दुष्यन्त
भगत पूर्णमल गोपीचंद राजा हरिश्चन्द्र छोरे बागडी
सेठ ताराचंद धर्मपाल-शांताकुमारी चीर पर्व ताकूतोड बाल्टीफोड
विराट-पर्व कृष्ण सुदामा नल-दमयन्ती जैमलफत्ता
पदमावत चन्द्रहास भूप पुरंजन

2 बाजे भगत:-
बाजे भगत का जन्म 1899 ई. में सावन बदी त्रयोदशी को जिला सोनीपत के दहिया खाप के गांव सिसाणा में हुआ। ‘‘कहै बाजे भगत ससाणे आला, लाभ रहो चाहे हाणी’’ इनके पिता का नाम श्री बदलूराम तथा माता का नाम श्रीमती बदामो देवी था। बाजे भगत तीखे नयन-नक्श, सांवला कृष्ण रंग, गठीला बदन, घुंडीदार मूंछे और 6 फुट का कद, एक आकर्षक व्यक्तित्व के धनी थे। उन्होंने शैशवावस्था में ही शिक्षा परित्याग कर लोकनाट्य रूपी रामलीला में अभिनय करना प्रारम्भ कर दिया। सांगीत की दुनिया में उन्होंने सुप्रसिद्ध सांगी गोरड़ निवासी श्री हरदेवा को अपना गुरू बनाया। ‘‘बाजे भगत के सतगुरू थे गोरड़ के स्वामी हरदेवा’’।2 श्री हरदेवा को गुरू धारण करके उनकी सांग मण्डली में दस वर्ष तक रहे तथा बाद में अपनी अलग सांग-मण्डली बनाकर लगभग 12 वर्ष तक सांगो का मंचन किया।

उस युग में समाज में जातिप्रथा, रूढ़िवाद व अन्य सामाजिक बुराईयां अपनी चरम सीमा पर थी। ऐसे वक्त में समाज में इन रूढियों के खिलाफ टक्कर लेना कोई आसान काम नहीं था। भारतीय समाज की बहु-विवाह (एक से ज्यादा विवाह करना) नामक सामाजिक कुरीति पर तीक्ष्ण प्रहार करते हुए लोक कवि बाजेभगत समाज को किस प्रकार एक उपदेश देते हैं:-

भाइयो जिसतै टूटै नाड़, बोझ इसा ठाईयो ना,
इज्जत आले का नाश करादे, रांड के लाड लडाईयो ना,
सूली से दुःख मोटा हो सै, नांटू सूं दूजा ब्याह कराईयों ना,
कोई सुणता हो तो, नारी दूसरी ल्याइयो ना,
या कित चन्द्रकिरण ब्याही, मेरे कर्मा की करड़ाई थी।

‘गोपीचन्द’ नामक सांगीत में लोककवि ने पुत्र से माँ अलग होने के बाद माता की मनःस्थिति का स्वाभाविक वर्णन किया है। गोपीचंद अपनी माता के आदेशानुसार गोरखनाथ के पास जाकर दीक्षा ग्रहण कर लेता है। फिर गोपीचंद की माता बाबा गोरखनाथ से अपने पुत्र को वापस लेने आती है और कहती है-

बेटे बिन माता के दिल म्य, हो सै घोर अन्धेरा,
मेरे गोपीचंद ने दिखा दिए, कित लाल ल्हको गेरा,

अपने बेटे गोपीचंद नै जोग दुवाणा ना चाहती,
अपनी आंख के तारे नै दूर हटाणा ना चाहती।

इस प्रकार हरियाणवी सांग की महत्वता बढाने वाले सरस्वती पुत्र श्री बाजे भगत एक अनसुलझी गुंथी के उपरान्त सन 1936 ई. मे वे नफरत के तूफान मे फंसकर इस निधि को छोडक़र परमपिता परमात्मा के चरणों में जाकर अपनी अनमोल विरासत छोडक़र चले गए।

बाजे भगत ने 22 के लगभग सांगीतों का लेखन एवं मंचन किया। उनके प्रमुख सांग इस प्रकार हैः-

शकुन्तला-दुष्यन्त कृष्ण-जन्म
गोपीचन्द नल-दमयन्ती
रघबीर-धर्मकौर महाभारत आदिपर्व
पदमावत सत्यवती देवी
चन्द्रकिरण सत्यवादी हरिश्चन्द्र
सरवर-नीर अजीत सिंह राजबाला
हीरामल-जमाल ज्यानी चोर
भगत पूर्णमल चन्द्रवती कृष्णदत
हीर-रांझा नौटंकी इत्यादि

वैसे तो अब बाजे भगत के पौत्र अशोक कुमार को ‘हीर रांझा’ एवं ‘नौटंकी’ सांगीतो की कुछ-कुछ रागनियां भी मिली है।

3 गंधर्व पंडित नन्दलाल-

गन्धर्व कवि पंडित नन्दलाल का जन्म पंडित केशवराम के घर गाँव पाथरआली, जिला भिवानी मे 29-10-1913 को हुआ था | इनके पिता जी केशवराम भी अपने समय मे उच्चकोटि के लोककवि व लोकगायक थे | नन्दलाल जी 5 भाई व 6 बहनों मे 10 वे नम्बर के थे | पांचो भाईयो मे श्री भगवाना राम जो कि जवान अवस्था मे स्वर्ग सिधार गए थे | दुसरे नम्बर पर श्री कुंदनलाल जी, तीसरे नम्बर पर श्री बनवारी लाल जी, चौथे नम्बर पर स्वयं श्री नन्दलाल जी तथा पांचवे नंबर श्री बेगराज जी थे | इनको बचपन से ही कविताई व गायकी का शौक था | इनके पिता श्री केशोराम श्री शंकरदास के शिष्य थे जिन्हें ब्रह्मज्ञानी भी कहते है | ये नन्दलाल जी तीनो सगे भाई कवि थे – नन्दलाल, बेगराज जी, कुंदनलाल जी | इस प्रकार केशोराम जी के शिष्य कुंदन लाल जी थे और कुंदन लाल जी शिष्य श्री नन्दलाल जी और नन्दलाल जी के शिष्य बेगराज जी थे | श्री नन्दलाल जी बचपन मे दिन मे तो गौ चराते थे और रात को बड़े भाई कुंदनलाल जी का जहां भी प्रोग्राम होता था, तो छुप-छुप के सुनने चले जाते थे | उसके बाद थोड़े बड़े होने पर ये हरिराम सांगी– गाँव बहु झोलरी– रोहतक वाले पास रहने लगे | जब इस बात का पता इनके बड़े भाई कुंदनलाल लगा तो उन्होंने इनको अपने पास बुला लिया और अपने साथ बेड़े मे रखने लग गये | उसके बाद नन्दलाल जी ने फिर 13 साल की उम्र मे अपना अलग बेड़ा बांध लिया | उन्होंने अपना पहला प्रोग्राम लगातार 15 दिन तक गाँव चिडावा-राजस्थान मे किया था क्यूंकि ये हमेशा तत्काल ही बनाते थे और तत्काल ही गाते थे | इनकी एक खास बात ये थी कि वो लोगो की फरमाईस पूछते थे कि आप सज्जन पुरुष कोनसे प्रकांड या किस कथा की बात सुनना चाहते हो क्यूंकि इन्होने महाभारत, रामायण, वेद-पुराण, शास्त्र आदि का गहन अध्यन किया हुआ था | ये माता सरस्वती से वरदानी थे, जोकि गौ चराते समय माता सरस्वती ने इनको साक्षात् दर्शन दिए थे | इसलिए इनकी जिह्वा पर माँ सरस्वती का वास था | इनको हरियाणवी लोक साहित्य मे अपने भजनों मे दौड़ (सरड़ा/संगीत) की एक अनोखी कला का सर्वप्रथम शुरुआत करने का श्रेय है, जिसके अन्दर उस प्रसंग का कड़ी से कड़ी सम्पूर्ण सार होता था | इनकी कविता जितनी जटिल थी, उतनी ही रसवती भी थी | इनको महाभारत के 18 के 18 पर्व कंठस्थ याद थे तथा जिनको कविता के रूप मे गाते रहते थे | आज तक हरियाणवी लोकसाहित्य काव्य मे 100 कौरवो और 106 किचको को नाम सिर्फ इन्होने ही अपनी कविताई मे प्रस्तुत किये है अन्यथा किसी भी कवि ने प्रस्तुत नहीं किये | इनकी कविता मे आधी मात्रा की भी त्रुटी नही मिल सकती तथा इनकी रचनओ मे अलंकार व छंद की हमेशा ही भरमार रहती थी, इसलिए नन्दलाल जी प्रत्येक रस के प्रधान कवि थे |

दोहा- श्रीकृष्ण जन्म-आत्ममन, नटवर नंद किशोर ।
सात द्वीप नो खण्ड की, प्रभु थारै हाथ मैं डोर ।।

कहूँ जन्म कथा भगवान की, सर्व संकट हरणे वाली ।। टेक ।।
घृत देवा शांति उपदेवा के बयान सुणो,
श्री देवा देव रक्षार्थी धर करके नै ध्यान सुणो,
सहदेवा और देवकी के नाम से कल्याण सुणो,
सात के अतिरिक्त एक दस पत्नी और परणी,
पोरवी, रोहिणी, भद्रा, गद्रा, ईला, कौशल्या यह बरणी,
केशनी, सुदेवी कन्या, रोचना देवजीती धरणी,
रोहिणी से सात जन्मे उनके तुम नाम सुणो,
गद्ध, सारण, धुर्व, कृत, विपुल, दुरवूद, बलराम, सुणो,
देवकी के अष्टम गर्भ प्रगटे शुभ धाम सुणो,
जो माया दया निधान की, वो कभी न मरने वाली ।1।

श्री शुकदेव मुनि देखो परीक्षित जी से कहैं हाल,
नर लीला करी हरि संग लिए ग्वाल बाल,
कंस को पछाड़ मारे जरासंध शिशुपाल,
प्रथम यदुवंशियों में राजा भजमान हुया,
उनके पुत्र पृथ्रिक उसके विदुरथ बलवान हुया,
उनके सूरसेन सर्व राजों में प्रधान हुया,
सूरसेन देश मथुरापुरी रजधानी थी,
सूरसेन भूपति के भूपति कै मरीषा पटराणी थी,
दस पुत्र पाँच कन्या सुशीला स्याणी थी,
ना कमी द्रव संतान की, सेना रिपु डरने वाली ।2 ।

जेष्ठ पुत्र वसुदेव सत्रह पटरानी ब्याही,
देवक सुता देवकी थी उन्ही से हुई सगाई,
बड़ी धूमधाम से सज के बारात आई,
आहुक नाम एक नृप वर्षिणी जो वंश सुणो,
उग्रसेन पवन रेखा बदल गया अंश सुणो,
द्रुमलिक राक्षस से पैदा हुया कंस सुणो,
वेद विधि सहित जब देवकी का ब्याह हुया,
बालक युवा वृद्ध पुरुष नारियों मैं चाव हुया,
ढप ढोल भेर बाजै पूरी मैं उत्साह हुया,
ना कवि कह सकै जान की, गिरा वर्णन करने वाली ।3 ।

चार सौ हाथी अठारह सौ रथ जब सजा दिये,
दस सहस्र हय वेग प्रभंजन के लजा दिये,
दो सौ दासी दास वै भी दुंदुभी बजा दिये,
बारात विदा करी सब चलने को तैयार हुए,
उग्रसेन पुत्र कंस रथ में सवार हुए,
गज वाजि रथ पैदल साथ मैं अपार हुए,
मथुरापुरी गमन सकल बारात हुई,
गुरु कुन्दनलाल कहते आश्चर्य की बात हुई,
सेवक नंदलाल ऊपर राजी दुर्गे मात हुई,
करो शुद्धि मेरी जबान की, गुण उर में भरने वाली ।4।

दोहा- सकल समूह जन सुन रहे, नभ वाणी कर गौर ।
अरे कंस कहाँ गह रह्या, कर रथ घोड़ां की डोर ।।

वैसे तो नन्दलाल जी ज्यादातर सांगीत मंचन व कथा कार्यक्रम दक्षिण हरियाणा व समीपवर्ती राजस्थान के क्षेत्रों मे ही किया करते थे, लेकिन समय समय पर आमंत्रण के तौर पर वे दूर-दराज के क्षेत्रों व अन्य राज्यों मे भी उनको अच्छी खासी ख्याति प्राप्त थी | इसीलिए एक समय का जिक्र है कि सन 1960 मे हरियाणा-पंजाब के तत्कालीन मुख्यमंत्री श्री प्रताप सिंह कैरव ने एक बार चंडीगढ़ मे लोककवि सम्मलेन करवाया, जिसमे लगभग आस पास के क्षेत्रों से उस समय के महानतम 35 लोककवियों ने भाग लिया | उसके बाद फिर कवि सम्मेलान पूर्ण होने के बाद मुख्यमंत्री जी ने गंधर्व कवि नन्दलाल जी की निम्नलिखित रचना को सुनकर प्रथम पुरस्कार के रूप मे उस समय 1100/- रुपये की राशि प्रदान की तथा मुख्यमंत्री जी ने इस कवि सम्मलेन समारोह के सम्पूर्ण होने की सुचना व प्रथम पुरुस्कार विजेता पंडित नन्दलाल जी को सर्वोत्तम कलाकार के तौर पर उनकी प्रशंसा के रूप मे उन्होंने इसकी सुचना एक अखबार के माध्यम से की |

गुलिस्तान की छवि कहैं क्या ऐसा आलीशान बण्या,
सुरपति का आराम कहैं या मनसिज का अस्थान बण्या।। टेक ।।
दाड़िम, दाख, छुहारे न्यारे, पिस्ते और बादाम लगे,
मोगरा, केवड़ा, हिना, चमेली, खुशबूदार तमाम लगे,
अखरोट, श्रीफल, चिलगोजे, कदली, अंगूर मुलाम लगे,
नींबू, नारंगी, चंगी, अमरूद, सन्तरे, आम लगे,
जूही, बेला, पुष्प, गुलाब खिल्या, एक आत्म परम स्थान बण्या।।

मौलसरी, चंपा लजवंती, लहर-लहर लहराई थी,
केतकी, सूरजमुखी, गेंदे की, महक चमन मै छाई थी,
स्फटिक मणी दीवारों पै, संगमरमर की खाई थी,
गुलिस्तान की शोभा लख, बसंत ऋतु शरमाई थी,
बाग कहुं या स्वर्ग, इस चिंता मै कफगान बण्या।।

मलयागर चंदन के बिरवे, केसर की क्यारी देखी,
बाग बहोत से देखे थे, पर या शोभा न्यारी देखी,
जिधर नजर जा वहीं अटकज्या, सब वस्तु प्यारी देखी,
सितम करे कारीगर नै, अद्भुत होशियारी देखी,
अमृत सम जल स्वादिष्ट एक तला, चमन दरम्यान बण्या।।

झाड़, फानुस, गिलास लगे, विद्युत की बत्ती चसती थी,
नीलकंठ, कलकंठ, मधुर सुर, प्रिय वाणी दसती थी,
मुकुर बीच तस्वीर खींची, तिरछी चितवन मन हंसती थी,
अष्ट सिद्धी, नव निधि, जाणु तो गुलिस्तान मै बसती थी,
हीरे, मोती, लाल लगे, एक देखण योग्य मकान बण्या।।

शीशे की अलमारी भेद बिन, चाबी लगै ना ताळे मै,
कंघा, सीसा, शीशी इत्र की, पान दान धरे आळे मै,
चमकैं धरे गिलास काँच के, जैसे बर्फ हिमाळय मै,
एक जबरा पेड़ खड़्या था बड़ का, झूल घली थी डाळे मै,
परी अर्श से आती होगी, इस तरीयां का मिजान बण्या।।

चातक, चकवा, चकोर, बुलबुल, मैना, मोर, मराल रहैं,
सेढू, लक्ष्मण, शंकरदास के, परम गुरु गोपाल रहैं,
केशोराम सैल करते, खिदमत मैं कुंदनलाल रहैं,
कर नंदलाल प्रेम से सेवा, तुम पै गुरु दयाल रहैं,
मन मतंग को वश मै कर, ईश्वर का नाम ऐलान बण्या।।

उसके बावजूद इतना मानं-सम्मान व ख्याति पाने पर भी उनको कभी भी अहम भाव पैदा नहीं हुआ और इन्होने अपने जीवन मे कभी भी धन का लालच नही किया और सभी प्रोग्रामों के सारे के सारे पैसे हमेशा धार्मिक कार्यों व गरीबो मे ही बाँट देते थे |

इनको साधू-संतो से विशेष लगाव था, जिसके चलते इन्होने 38 साल की उम्र मे बाबा शंकरगिरी को अपना शब्दगुरु बनाया था | उसके 6 महीने बाद बाबा बैंडनाथ की आज्ञानुसार इन्होने सन्यासी रूप धारण कर लिया था तथा बाबा बैंडनाथ के पास अपने ही गाँव के पास खेतों मे बाबा बैंडनाथ के साथ कुटी बनाकर उनके साथ ही रहना शुरू कर दिया था तथा गृहस्थ आश्रम से सन्यास ले लिया था | क्यूंकि नन्दलाल जी के शिष्य पंडित गणेशी लाल जी, जो गाँव- नौलायचा-महेंद्रगढ़ के निवासी है, जो अभी भी 85 की उम्र मे हमारे साथ विद्यमान है और हमेशा नन्दलाल जी के साथ ही रहते थे, उनके अनुसार एक बार नन्दलाल जी बालेश्वर धाम पर गए हुए थे और वहां के प्रसिद्द संत श्री सुरतागिरी महाराज के आश्रम पहुंचे | जब नन्दलाल जी उस आश्रम के द्वार पर पहुंचे तो सुर्तागिरी महाराज ने बिना किसी परिचय के वहा उनको प्रवेश करते ही उनको उके नाम नन्दलाल से ही पुकार दिया क्यूंकि सुर्तागिरी जी एक त्रिकालदर्शी थे संत थे | उसके बाद नन्दलाल जी ने सुर्तागिरी महाराज से पूछा कि आप मेरे को कैसे जानते हो | फिर महाराज सुर्तागिरी ने नन्दलाल जी को अन्दर आकर पूर्व जन्म का सम्पूर्ण वृतांत सुनने को कहा | उसके बाद नन्दलाल जी ने पहले तो वहां एक दिन के लिए आराम किया तथा दुसरे दिन उस आश्रम मे दो ही भजन सुनाये थे तो फिर भजन सुनने के बाद महाराज सुरतागिरी महाराज ने नन्दलाल जी को ज्ञात कराया कि आप पिछले जन्म मे दरभंगा के राजा के राजगुरु थे | फिर सुर्तागिरी महाराज ने नंदलाल जी के बारे मे आगे बताते हुए कहा कि एक बार राजा को यज्ञ करवाना था तो फिर आपने उस यज्ञ का शुभ मुहूर्त बताया और फिर राजा ने आपसे यज्ञ प्रारंभ के समय पर पहुँचने की विनती की | फिर जब राजा ने मुहूर्त के अनुसार यज्ञ शुरू करवाते समय उस दिन उनके मन मे उतावलेपन के कारण विलम्बता का शंशय पैदा होने के कारण यज्ञ मुहूर्त मे समय रहते हुए ही यज्ञ को आपके आने से पहले ही शुरू करवा दिया | फिर आप जब वहां यज्ञ मुहूर्त के अनुसार समय पर पहुंचे तो राजा यज्ञ शुरू करवा चुके थे | फिर आपने अतिशीघ्रता से यज्ञ को शुरू होते देखा तो आपने अपना अपमान समझकर क्रोधवश आपकी सारी पोथी-पुस्तके उस हवन कुंड मे डालकर उसी समय वनवासी हो गए | इसी कारण फिर आपका पोथी-पुस्तक ज्ञान तो हवन कुण्ड मे जल गया था और आपके अन्दर जो पिछले जन्म का हर्दयज्ञान बचा था उसका बखान आप इस कलयुग के समय मे अपने गृहस्थ जीवन मे जन्म अवतरित होकर कर रहे | फिर उसके बाद सुर्तागिरी महाराज ने नन्दलाल जी से कहा कि आपका सन्यासी जीवन अभी शेष है और आपको पिछले जन्म की तरह आपको कुछ समय सन्यासी जीवन व्यतीत करना पड़ेगा | इस प्रकार फिर बालेश्वर धाम मे सुर्तागिरी महाराज द्वारा की गई भविष्यवाणी अनुसार नन्दलाल जी को 38 साल की उम्र मे सन्यास आश्रम जाना पड़ा | इस प्रकार गंधर्व लोककवि प. नन्दलाल रविवार के दिन 27-10-1963 को अपनी पवन कुटिया मे विजय दशमी के अवसर अपना चोला छोड़ पूर्वजन्म का कर्मयोग करके इस भवसागर से पार हो गये|

इन्होने कौरवो और पांड्वो के जन्म से लेकर मरणोपरांत तक सभी प्रसंगो पे कविताई की, जैसे- विराट पर्व, गौ हरण, द्रोपदी स्वयंवर, कीचक वध….
इन्होने सभी प्रमाणिक कथाओं के तौर पर नल दमयंती कथा , राजा हरिश्चंद्र कथा , पूर्णमल, जानी चोर, चन्द्रहास, बब्रुभान, लक्षकंवर का टीका, कृष्ण जन्म, रुकमनी मंगल, सम्पूर्ण रामायण, काला तुहड़ी ( इनको काल का रूप बताकर उनका पूरा चक्र समझा दिया), राजा अमरीष आदि |

4 कवि शिरोमणि पं0 मांगेराम :-

पं0 मांगेराम का जन्म जुलाई 1905 में गांव सिसाणाए जिला रोहतक में हुआ। इनके पिता का नाम श्री अमरसिंह और माता का नाम श्रीमती धर्मों देवी था। इनके पिता लगभग 80 बीघा जमीन के मालिक थे। इनके पांच लडके सर्वश्री मांगेराम, टीकाराम, हुक्मचंद, चन्द्रभान और रामचन्द्र वकील तथा एक लडकी गोधां थी। इनमें से पं0 मांगेराम ज्येष्ठ पुत्र थे। मांगेराम को इनके नाना उदमीराम ने गोद ले लिया था। इस प्रकार ये गांव सुसाणा में जन्म लेकर पांणची वासी बन गये। ऐसा वर्णन उनके अनेक छन्दों में मिलता है-

‘‘पाणची म्हं रहण लागग्या, मांगेराम सुसाणे का।

पं0 मांगेराम के नाना पं0 उदमीराम धार्मिक प्रवृति के व्यक्ति थे। उनकी रूचि भजनों में थी। नाना की इस रूचि का प्रभाव बालक मांगेराम पर भी पडा और उनका रूझान संगीत की ओर होता चला गया। सन् 1930 के आस-पास जब पं. मांगेराम की आयु लगभग 25 वर्ष थी। इन्होंने सांग मण्डली में सम्मिलित होने की इच्छा प्रकट की, परन्तु घरवालों ने इसकी इजाजत नहीं दी। कुछ समय पश्चात् घरवालों की मर्जी के खिलाफ पं0 मांगेराम सांग मण्डली में शामिल हो गये तथा उस समय के प्रसिद्ध सांगी पं0 लखमीचंद से प्रभावित होकर उनको विधिवत् गुरू मान लिया। सांग कला में निपुण होने के पश्चात् पं0 मांगेराम ने अपने गुरू से अलग होकर स्वतन्त्र सांगी बेडा स्थापित किया तथा अपने गीत-रागनी स्वयं बनाने लगे। पं0 मांगेराम के लगभग सभी सांगों को लोक जीवन में ख्याति मिली थी और अपनी रचनाओं मे गुरु के प्रति अटूट श्रद्धा दिखाकर गुरु भक्ति को चरमोत्कर्ष पर पहुँचाया तथा गुरु लख्मीचंद को पुनः अमरत्व प्रदान किया जो आज आज तक हमारी आत्माओं मे बसा हुआ है। इनके दो सांगो ‘धु्रव भगत’ और ‘कृष्ण जन्म’ को विशेषतः लोक प्रसिद्धि मिली और कुछ सांग उनके विलुप्ता की कगार पर पहुँच गये थे जो कभी अन्य लोक गायकों द्वारा कभी हमारे बीच गायन मे नहीं आये। उन्ही मे से है एक सांग है- जादू की रात और इस सांग की एक श्रृंगारिक रचना निम्नलिखित मे इस प्रकार प्रस्तुत है.

मिंचते आंख दिखाई दे सै, कमरा शीश्यां आला,
सुती पड़ी पलंग पै देखी, था माशूक निराला ।। टेक ।।

लाल किरोड़ी पड्या रेत मैंए जो तड़कै पाग्या होगा,
देख परी नै हूर परी कै भी, दहका सा लाग्या होगा,
सारी ऐ बात बताई होगी, जब कुणबा जाग्या होगा,
तूं कहरया सै मनै रात नै, कोए सुपना आग्या होगा,
यो सुपना कोन्या साची बणरी, मैं न्यूं खाकै पड्या तवाला।

एक पहर का कहरया सूं, तनै कुछ भी जाणी कोन्या,
आख्यां देखी बात कहूं सूं, या जगत कहाणी कोन्या,
इन्द्राणी सती अनुसूईया जिसी, इसी ब्रहमाणी कोन्या,
तेरे मैं मेरा मन फंसग्या, तनै चलण की ठाणी कोन्या,
किसै भागवान नै बुलबुल कैसा, बच्चा ध्यान लगाके पाल्या।

आज तै आगै जंचली, सब नकली भाई चारा,
बणी-बणी के सब कोए साथी, ना बिगड़ी मैं प्यारा,
बतलावण की श्रद्धा कोन्या, जी आख्यां मैं आरया,
गजब का गोला आण पड़्या, जब बजे रात के बारा,
एक माणस कै डाका पड़ग्या, यो सारा.ऐ.देश रुखाला।

थारे भाई पै विपता पड़री, मिलकै दर्द बांटल्यो,
गहरा जख्म नदी सी खुदरी, मिलकै गैल आंटल्यो,
खाकै जहर मरुंगा, उस बिन बेशक मनै नाटल्यो,
मांगेराम नै मीठा बोलकै, बेशक नाड़ काटल्यो,
बहुत आदमी करते देखे, मनै पूंजी राख दिवाला।

वैसे तो मांगेराम जी ने अपने गुरु लख्मीचंद के सांगो से प्रभावित होकर बहुत पहले ही कुछ फुटकड़ रचनाओं को बनाना और गुनगुनाना शुरू कर दिया था, जब वे अपनी मोटर-लोरी लेकर श्री लख्मीचंद जी के सांगो का रसपान करने के लिए जगह-जगह पहुच जाते थे लेकिन उन्होंने जब तक श्री लख्मीचंद को अपना गुरु धारण नहीं किया था, वे सिर्फ उनके सांगो को सुनकर अपने शुरूआती अध्यन मे थोडा बहुत कोई कोई फुटकड़ रचना बनाकर अपने मित्र मण्डली व बाद मे कभी कभी श्रोताओं व अपने मित्र मण्डली की फरमाईश पर अपने सांगो को प्रारंभ करने से पूर्व व अंत मे किसी धर्मशाला व अन्य थौड़.ठिकानों पर भी सुनाया करते थे। फिर इसी विषय को आगे बढ़ाते हुये पंडित मांगेराम जी के ही प्रिय शिष्य पंडित राजेराम जी ने मांगेराम जी की एक ऐसी ही बहुत ही कमसुनी फुटकड़ रचना पे प्रकाश डालते हुए निम्नलिखित मे बताया है, जो उनके गुरु पंडित लख्मीचंद के राजा हरिश्चंद्र के सांग से प्रभावित रचना है।

28 दिन का रहणा होगा, भंगी आले घर मैं,
बोझ तलै मेरी नाड़ टूटगी, आगी गर्ब कमर मैं ।। टेक ।।

ठाल्ली झगड़े झोणे होगे, धर्म के मरवे बोणे होगे,
सौ सौ घड़वे ढोणे होगे, बाल रहया न सिर मैं।।

रहणा सहणा खास छुटग्या, अवधपुरी का वास छुटग्या,
एक लड़का रोहताश छुटग्या, बालक सी उम्र मैं।।

गहरी विपता ठाणी पड़गी, दर-दर ठोकर खाणी पड़गी,
मदनावत राणी पड़गी, न्युये ठाल्ली सोच-फिक्र मैं।।

अवधपुरी का रहणा छुट्या, मांगेराम ड्राईवर लुट्या,
ठोकर लागी घड़वा फूटया, चढ़ग्या सूरज शिखर मैं।।

सन् 1962 में पं0 मांगेराम ने गन्धर्व सभा बनायी थी, जिसमें उस समय के पांच प्रसिद्ध सांगी, पं0 मांगेराम, पं0 सुल्तान सिंह, धनपत, रामकिशन ब्यास तथा चन्द्रलाल उर्फ चन्द्रलाल बादी सम्मिलित थे। गन्धर्व सभा ने कई स्थानों पर अपने गीत-संगीत के कार्यक्रम पेश किये थे। हरियाणा की संगीत प्रेमी जनता ने गन्धर्व सभा द्वारा प्रस्तुत कार्यक्रमों की मुक्त कण्ठ से सराहना की। इस प्रकार फिर अपने समय के सर्वश्रेष्ठ लोककवि एवं सांगी पं0 मांगेराम का 16 नवम्बर 1967 ई0 को स्नान के पावन अवसर पर गढ मुक्तेश्वर में गंगा तट पर स्वर्गवास हो गया।

भारतीय समाज में उस व्यक्ति को धार्मिक वृति का और चरित्रवान समझा जाता है जो परोपकारी हो, दानी हो, सत्य का हिमायती, विषय-वासनाओं से दूर तथा परस्त्री को माता के समान एवं पराये धन को मिट्टी के समान समझने वाला हो। लोक कवि नं0 मांगेराम ने पिंगला-भरथरी नामक सांग में लोकधर्म का चित्रण इस प्रकार किया है-

गैर बीर आज्या तै मैं, सिर नीचै नै करल्यूं सूं,
पराये धन नै मिट्टी समझूं, देख-देखकै डरल्यूं सूं,
मामूली सी टुक होज्या तै, मैं इतने मैं मरल्यूं सू,
इस दुनियां के काम देखकै, मैं घूंट सबर की भरल्यूं सूं,

लोक कवि पं0 मांगेराम जी ने भी 45 के लगभग सांगीतों की रचना की थी, जिनमें उपलब्ध सांग इस प्रकार हैः-

१ भगतसिंह १६ सैन बाला ३१ सती सुशीला
२ वीर हकीकत राय १७ जयमल फताह ३२ गोपीचंद भरथरी
३ स्मरसिंह राजपूत १८ माल देव का आरता ३३ सुल्तान निहालदे
४ अमरसिंह राठौड़ १९ शिवजी का ब्याह ३४ चंद्रहास
५ बादल सिंह २० रुकमन का ब्याह ३५ ध्रुव भक्त
६ प्रेमलता २१ नौरतन ३६ चापसिंह सोमवती
७ हीर रांझा २२ रूप बसंत ३७ पूरणमल
८ लैला मजनू २३ सरवर नीर ३८ अजितसिंह राजबाला
९ हिरामल जमाल २४ राजा मोर ध्वज ३९ त्रिया चरित्र
१० हूर मेनका २५ हंसबाला राजपाल ४० नल दमयंती
११ शकुन्तला दुष्यन्त २६ राजा चित्रमुकुट ५१ रामायण वृतांत
१२ सभा पर्व २७ कृष्ण जन्म ४२ सती विपोला
१३ पिंगला भरथरी २८ कृष्ण सुदामा ४३ राजा भोज शारणदे नाई
१४ वीर विक्रम जीत २९ नौटंकी पार्ट २ ४४ देवयानी
१५ जादू की रात ३० सुकन्या चमन ऋषि ४५ महात्मा बुद्ध

5 पंडित रघुनाथ:-

पंडित रघुनाथ सिंह का जन्म सन 1922 मे ग्राम फिरोजपुरए निकट खेकड़ा, जिला बागपत मे पंडित देशराज के घर मे हुआ। पंडित रघुनाथ जी चार भाई थे-जिनमे रघुनाथ जी, हरिभजन जी, सत्यप्रकाश जी, वेदप्रकाश जी, जिनमे पंडित रघुनाथ सबसे बड़े थे और अशिक्षित थे जबकि बाकि तीनो भाई शिक्षित के साथ साथ सरकारी नौकरी मे थे। पंडित रघुनाथ जी की शादी शांति देवी के साथ गाँव रेवला खानपुर-दिल्ली मे हुई जिससे उनके उनको दो लड़की कुसुमए, शीला और चार लड़के हरिओम, देवेन्द्र, सुदर्शन, संजय हुए। पंडित रघुनाथ जी को बचपन से ही कविता सुनने, गाने व करने का शौक था। एक बार पंडित जी के गाँव मे रामलीला करने वाले आ गए थे और फिर उन्ही के साथ चले गए। उसके बाद फिर काफी दिनों बाद वापिस घर आये तो पिता जी ने कहा कि अगर तुझे रागनी गाने और सुनने का शौक है तो गाँव जांवली वाले पंडित मानसिंह के पास चले जाओ क्यूंकि पंडित देशराज जी गाँव जांवली मे एक कोल्हू कंपनी मे बाबू का कार्य करते थे। फिर पिताजी के कहने पर पंडित रघुनाथ गाँव जांवली मे पंडित मानसिह के पास पहुँच गए। फिर गाँव जांवली मे पंडित मानसिंह के पास जाने के बाद अपनी पहली मुलाकात मे ही पंडित रघुनाथ जी ने अपना गुरु धारण कर लिए। उस समय अंगेजों का शासन था तो घर मे सबसे बड़े होने के कारण वे मिलिट्री मे भर्ती हो गए। फिर इसी दौरान द्वितीय विश्व युद्ध चालू हो गया तो अंग्रेजो ने भारत से सेना बुलावानी शुरू कर दी। फिर पंडित रघुनाथ जी ने मेजर से बोले कि अगर हम बाहर चले जायेंगे तो यहाँ पे कौन लड़ेगा। फिर मेजर हिन्दुस्तानी होने के कारण उसने उनको वहां से चुपचाप निकाल दिया। फिर वहा से आने पर अंग्रेज पुलिस ढूंढने लगी। फिर एक बार पंडित रघुनाथ अपने गुरु की सांग मण्डली मे काम कर रहे थे तो वहां पर अंगेज जवान पहुँच गए और फिर उस अंग्रेजी पुलिस को देखकर वे मंच से उतरकर वे सांग सुन रहे श्रोताओं के बीच आ बैठे। फिर कुछ समय बाद पुलिस वापिस चली गई। फिर एक दो साल तक ऐसे ही पुलिस खोजती रही और पंडित रघुनाथ उनसे बचते रहे। फिर कुछ समय पश्चात् देश आजाद हो गया। उसके बाद वे अपनी कविता रचने लगे और लोगो को जगह जगह जाकर सुनाने लगे। पंडित रघुनाथ जी उस समय सुर्यकवि पंडित लख्मीचंद जी से बहुत ज्यादा प्रभावित थे। इसलिए पंडित लख्मीचंद जी के जो देशी तर्ज थी उन पर रघुनाथ जी ने अपनी कविताई करनी शुरू कर दी। बाद मे कुछ अपनी तर्जे और फ़िल्मी तर्जों पर भी कविताई करनी शुरू करदी। उनकी कविताई को पश्चिमी उतरप्रदेश मे जहां तक रागनी सुनी जाती थी वहां तक उनकी कविताई को काफी सरहाया जाने लगा और उस क्षेत्र के कवियों ने उन्हें ‘तन.वितन, की उपाधि से नवाजा गया जिसका मतलब इनके बुद्धि की कोई सीमा नहीं है। इसी दौरान उतरप्रदेश की प्रणाली से जमुआमीर के शिष्य हरियाणा निवासी धनपत सिंह सांगी भी उन्ही के समकालीन थे। फिर पंडित रघुनाथ जी के गुरु पंडित मानसिंह जी ब्रजघाट या गढ़ गंगा के मेले पर धनपत सिंह सांगी को अक्सर बुलाया करते थे। जब कभी रघुनाथ जी और धनपत जी दोनों का आमना सामना होता रहता था तथा आपस मे दोनों बारी बारी श्रोताओं को अपनी कला प्रभावित करते रहते थे। फिर भाईयो के शिक्षित होने के कारण वे अपनी कविताई उनसे ही लिखवाते रहते थे और फिर धीरे धीरे भाईयो के सहयोग से वे अपनी कविताई हिन्दी स्वयं ही हस्तलिखित करने लगे और स्वयं ही वे अपनी रचनाओं को जवाहर बुक डिपो-मेरठ व भगवत बुक डिपो-बुलंदशहर प्रेस के द्वारा छपवाने लगे। उनकी कविताई से प्रभावित होकर लगभग दो दर्जन शिष्य ने उनको अपना गुरु धारण किया। उन शिष्यों मे से चौ. घासीराम-गाँव सलेमाबाद, ठाकुर मंगल सिंह, जयचंद, निहाल, दयाकिशन, हरिराम जो सभी शीलमपुर-दिल्ली से थे और जयप्रकाश त्यागी पहलवान, रघुनाथ त्यागी, ईश्वर त्यागी, सुरेन्द्र शर्मा जो सभी गाँव रावली कलां से थे, फिर सत्यप्रकाश उर्फ़ प्रकाश, राजकुमार त्यागी जो सभी इन्ही के गाँव फिरोजपुरवासी थे, रामकिशन त्यागी, रामनिवास त्यागी, सतीश त्यागी जो सभी गाँव मण्डौला से थे, फिर एक रघुनाथ जी के फुफेरे भाई बद्रीप्रसाद शर्मा-गाँव खुर्रमपुर और पंडित रामकुमार शर्मा-गाँव नह्नवा और ब्रजपाल बाल्मिकी- गाँव चमरावल निवासी आदि शिष्य हुए।

हे सच्चे भगवान, बचाले जान, ये कैसा थाणा,
जहां मरे हुए नै भी मारै ।। टेक ।।

आज राज मै बुझ रही ना, सच्चे माणस चोखे की,
चोर डांट रहे कोतवाल नै, खरी मिशल मौके की,
सै धोखे की बात, कांप रहा गात, ना ठौड़ ठिकाणा,
जब प्यारे सिर नै तारै ।।

लोभी और लालची मानस, करज्या काम घणे माड़े,
चोर चौधरी पंच उच्चके, रिश्वत से चाले पाड़े,
फिरै लुन्गाड़े भजे, उड़ा रहे मजे, कपट का बाणा,
संत खता बिन हारै ।।

बिना दया चंडाल कसाई, पेट मांस से भरते,
धोरै बैठके जड़ काटै है, नहीं पाप से डरते,
यहाँ बुड्डे भी करते ब्याह, बिगड़ गया राह, ठीक कर जाणा,
जहां विधवा सुरमा सारै ।।

रिश्वत का संसार जगत मै, स्वार्थ घणा बढ़ा है,
रघुनाथ बावला भोला, थोड़ा ही लिखा पढ़ा है,
जो चढ़ा है सो ही ढला, बुरा और भला, राग का गाणा,
सब सुनके आप विचारें ।।
(सांग:- धर्मपाल-शान्ताकुमारी)

पंडित रघुनाथ साधू-संतो की संगत मे बहुत लगाव रखते थे इसलिए साधू-संतो की संगत मे उनकी कविताई को खूब पसंद किया जाता था । उन्होंने महाभारत को अपनी रचनाओ के बहुत ही विस्तृत रूप मे लिखा और उनके जितना विस्तृत महाभारात शायद ही किसी कवि ने अपनी रचनाओं मे लिखा हो। उनके इस साक्ष्यार्थ के तौर पर एक रचना पर प्रकाश डाल रहे है.

देखले रूप दिखाऊंगा, पार्थ करले दिव्य द्रष्टि ।। टेक ।।

सात द्वीप नौ खंड, तीन लोक न्यारे-न्यारे देख,
जल पृथ्वी आकाश वायु, अग्नि के चमकारे देख,
सागर और पहाड़ सूरज, चाँद सितारे देख,
वन बीहड़ तलाब नदी, नाले और किनारे देख,
अनेको फूल फल सुआद, खट्टे मीठे खारे देख,
एक रूप मै रूप अपने, शत्रु मित्र प्यारे देख,
बात सारी समझाऊंगा, मन माया से रची सृष्टी ।।

दाने देव नाग गंधर्व, किन्नर कलाधारी देख,
पशु पक्षी शेर हाथी, मारते किलकारी देख,
भुत और पिशाच मांस, मारते शिकारी देख,
छोटे बाल ग्वाल बुड्ढ़े, जवान नर नारी देख,
अहंकारी शस्त्रधारी, लालची व्याभिचारी देख,
लख चौरासी योनी भोग, भोगते संसारी देख,
तेरा संकोच मिटाऊंगा, है आखिर धर्म आरिष्टि ।।

एक ही सूरत मै मूरत, छोटी और बड़ी देख,
कुरुक्षेत्र मै दोनु सेना, शस्त्र लेकै खड़ी देख,
भरी है जोश मै फ़ौज, पर्ण करके अड़ी देख,
बड़े बड़े महारथियों की, नाड़ कटी पड़ी देख,
अपने आप अर्जुन अपनी, यश पाने की घड़ी देख,
रणभूमि मै सेना लड़ती, हथियारों की झड़ी देख,
भ्रम सब दूर भगाऊँगा, लिए सत की जाण समष्टि ।।

अपने शत्रु अपणे आगै, जोश के म्हा अरे देख,
शूरवीर गरजै और, कायर मन मै डरे देख,
कौरवों के सारथी सारे, अहंकारी मरे देख,
योगिनी कालका काली, खाली खप्पर भरे देख,
कर्मों के आधीन आज, सारे काम करे देख,
मानसिंह गुरु के ज्ञान, लयदारी मे खरे देख,
सुर मै भरके गाऊंगा, रघुनाथ राग रंग की वृष्टि ।।
(सांगरू गीता उपदेश – कृष्ण-अर्जुन संवाद)

इस तरह इस महान कवि का पार्थिव शरीर सन 1977 मे होली के दिन पंचतत्व मे लींन हो गया।

उन्होंने लगभग 31 सांगो की रचना की जो निम्नलिखित प्रकार से है।

महाभारत भीष्म पर्व राजा हरिश्चंद्र
कृष्ण जन्म द्रोण पर्व सत्यवान सावित्री
भीम का ब्याह जयद्रथ वध राजा मोरध्वज
द्रोपदी स्वयम्वर परीक्षित नवल्दे अजित सिंह राजबाला
द्रोपदी चीरहरण चित्र विचित्र धर्मपाल शान्ताकुमारी
वन पर्व देवयानी शर्मिष्ठा वीर हकीकतराय
कीचक वध पूर्णमल नुनादे पृथ्वीराज संयोगिता
गौ हरण पूर्णमल सुंदरादे रूपवती चूड़ावत
कृष्ण भात नल दमयंती भाग.1 गौतम अहिल्या
गीता उपदेश नल दमयंती भाग.2
श्रवण कुमार लव.कुश काण्ड

6 राय धनपत सिंह .

पं0 मांगेराम के समकालीन तथा उनके पश्चात भी एक दशक से अधिक तक सांगों का मंचन करने वाले प्रतिष्ठित सांगीतकार श्री धनपत सिंह का जन्म सन् 1915 ई0 में गांव निन्दाना जिला रोहतक में हुआ। इनके पिता का नाम श्री चन्दामीर तथा माता का नाम श्रीमती भूली देवी था। इन्होंने उर्दू में आठ कक्षाएं पास की थी। पन्द्रह वर्ष की आयु में गांव सुनारिया, रेाहतक निवासी जगुआमीर को अपना गुरू बनाया। गुरू जी से सांग कला सीखकर इन्होंने अपनी अलग सांग मण्डली बनाई। लगभग 19 वर्ष की आयु में इन्होंने पहला सांग गांव निन्दाना में किया था।

श्री धनपत सिंह के सांगों की हरियाणा के ग्रामीण अंचल में खूब धूम मची। बणदेवी, लीलो-चमन, हीर-रांझा, जानी चोर, और गोपीचंद आदि उनके महत्वपूर्ण सांग है जिन्हें हरियाणा प्रदेश में अच्छी ख्याति प्राप्त हुई। इनके अधिकतर सांगों में प्रेमाख्यानक होने के कारण श्रृंगार रस अधिक मुखर रहा है। इनके पास ‘श्याम’ नामक खूबसूरत नवयुवक नचार था, जिसके समय में इनके सांगों की खूब चर्चा रही है। श्याम गांव घरौदी, जीन्द हरियाणा में एक प्रतीक बन गया है- सुकोमार्य का। हरियाणा प्रदेश के ग्रामीण में किसी खूब-सूरत नौजवान को देखकर आज भी कह दिया जाता है- बेटे श्याम।

श्री धनपत सिंह हरियाणा प्रदेश मे लोकप्रिय सांगीतकार रहे है। वे जहां भी सांग करने गए वहीं उनका भव्य स्वागत हुआ। धनपत के 52 शिष्यों में से बन्दामीर उन्हें बहुत प्रिय थे। इनका मुख्यतः सांग लीलो-चमन नामक सांग इसलिए प्रसिद्ध हुआ क्योंकि इसकी कथा भारत-पाक विभाजन की सत्य घटना पर आधारित थी। दुर्भाग्यवश धनपत जी बीमार हो गए लम्बी बीमारी से लडते-लडते यह महान् लोक कवि 29 जनवरी 1979 को स्वर्ग सिधार गए।20

सामाजिक, धार्मिक एवं राष्ट्रीय चेतना युक्त जनकवि धनपत सिंह ने बादल नामक सांगीत मंे युवाओं को देशभक्ति के मूल्यों के प्रति जागृत करते हुए कहा-

देश शमां पै चाहिये जलना, बणके परवाना,
हम बुलबुल देश हमारा, खास आशियाना,
हंसते-हंसते देश ऊपर, चाहिए मर जाना,
इतिहास मैं लिखी जाए, तेरी याद रहे कुरबानी।

संगीतकार धनपत सिंह ने 50 के लगभग सांगीतों का मंचन एवं लेखन किया है। जिनमें से कुछ इस प्रकार से हैः-

हीर-रांझा ज्यानी चोर
हीरामल जमाल जंगल की राणी
शीलो अशोक बणदेवी
सूरज चन्दा राजा नल
गोपीचन्द गजना गोरी
अमरसिंह राठौर राजा अम्ब
रूप बसन्त राजा हरिश्चन्द्र
लीलो चमन अंजो मनियार
बादल बागी निहालदे सुलतान
पटवे की नया त्यौहार
बादल आदि

7 श्री चन्द्रलाल भाट उर्फ बेदी:-

सांगीतकार चन्द्रलाल भाट का जन्म 1923 में जीन्द रियासत के चरखी दादरी कस्बे के गोधडिया ब्राहाण नामक गांव में हुआ था। चन्द्रलाल के पिता का नाम सोहनलाल था जो भजनोपदेशक थे। उन्होंने अपने गांव के बारे में एक छंद में स्पष्ट करते हुए कहा है…

चरखी बराबर छत नहीं, सांगवाण जहां जाट।
उसी चरखी में गोधडिया ब्राहाण, वहीं से चन्द्र भाट।।

जन्म के कुछ वर्ष बाद इनके माता-पिता इस गांव को छोडकर दत्तनगर, उत्तर प्रदेश चले गये। इस प्रकार चन्द्रलाल भाट दत्तनगर, जिला मेरठ के निवासी बन गये। उनके द्वारा अपनी जन्मभूमि को छोडकर दत्त नगर जाने का उल्लेख निम्न दोहे में है-

जन्मभूमि रियासत जीन्द में, दत्तनगर किया है वास।
गोधडिया विप्र गांव चन्दर का, चरखी में समझ निकास।।

चन्द्रलाल उर्दू में पांचवी पास थे। ये हरियाणवी के अलावा उर्दू, पंजाबी, हिन्दी, एवं राजस्थानी इत्यादि भाषाओं का ज्ञान रखते थे। सांगी चन्द्रलाल भाट के गुरू मंगलचंद थे। ‘प्रेमजान चन्द्रपाल’ नामक सांगीत में उन्होंने अपनी गुरू परम्परा का उल्लेख इस प्रकार किया है-

कविताई के ज्ञाता सेढू लक्ष्मण और गोपाल गये।
स्वामी शंकरदास दादा गुरू नत्थूदास गये।
गुरू छदं लड़ी बन्द मंगलचन्द कर कमाल गये।

इनके सांगों मे आधुनिकता की छाप होती थी। वे फिल्मी तर्जों पर सांग की रागनियां गाया करते थे। ‘‘चन्द्रलाल नई तर्जों में रोज करै कविताई’’

अन्य छंद में
‘‘चन्द्रलाल नये फैशन की रागनी सबाके घायल करगी’’।

चन्द्रलाल जी के शब्दों में ‘‘हमारी टक्कर सांगियों से नहीं, हमारी टक्कर तो बम्बई वालों से है।’’ इन्होंने सबसे पहले नागिन फिल्म के गानों की धुन पर रागनियां गानी शुरू की। इसके बाद तो युवाओं की मांग के अनुसार सभी सांगों की रागनी फिल्मी धुनों पर गाने लगे। इसके अलावा इन्होंने सबसे पहले महिला पात्रों का अभिनय करने के लिए लड़कियों को मंच पर उतारा लेकिन कुछ समय बाद फिर लड़कों से ही अभिनय करवाने लगे। हरियाणवी सांग को नई दिशा देने वाला यह महान् सांगीतकार 6 अगस्त 2004 को इस भौतिक संसार से विदा हो गया।

चन्द्रलाल जी ने ‘‘सैल बाला’ नामक सांगीत में आधुनिक समाज के लोगों के जीवन मूल्यों में परिवर्तन का उल्लेख निम्न पंक्तियों में किया है-

मतलब का रह गया जमाना, सब न्यारे पाटण लागे।
आँख्याँ मै शर्म रही ना, लेकै कर्ज नाटण लागे।।

महान लोककवि चन्द्रलाल भाट उर्फ बेदी ने 100 के आस-पास सांगीतों का लेखन व मंचन किया। इनमें से कुछ सांग इस प्रकार है-

गजना गोरी माया देवी
मेहनादेवी चम्पादे माली की
रतना बादल हीर-रांझा
बीजा सोरठ शाही लाल बहार
कान्ता देवी शाही सुहागन का दुहाग
दमयन्ती स्वयंवर धन्ना जाट
चन्द्रपाल सुमित्रा अंजना दिसौटा
गुलशन गुलबहार निहाल्दे परवाना
इन्दल दिसोटा अजीत सिंह राजबाला
सत्यवान सावित्री संसार चक्र
नौबहार पृथ्वी सिंह किरणमई
हूर मेनका दुष्यन्त शकुन्तला
नौ दो ग्यारह आठ चार बाहर
कृष्णभात गौ-हरण
कीचकवध भीम जीमल मल्लयुद्ध31
रूप बसन्त रूपा राधेश्याम
अनारकली जीजा साली
शैणबाला हरियाणे की चोट
छोरी स्कूटर आली ऊँखा
सत्यवती फूलकंवर छोरा कर्मवीर
सरल देवी भक्त प्रह्लाद
गंगा जमुना संगम की चोट
देवर-भाभी मंगल राजा
मेहनदे शाही मनियार

8 पं0 रामकिशन व्यास:-

सांगीत के जादूगर पं0 रामकिशन व्यास का जन्म 13 अक्तूबर 1925 ई0 को नारनौद, हिसार में पं0 सीताराम के घर हुआ। सन् 1940 में रामकिशन व्यास प्रतिष्ठित लोक कवि माईराम की छत्रछाया में आए जहां उन्होंने सांग की विद्या के साथ-साथ कविता लेखन में काबिलियत हासिल की। पहली बार उन्होंने ‘ देवी माई करो सहाई, विद्या वरदान देवी’ भेंट लिखी। इसके बाद उन्होंने सफलता के नए आयाम स्थापित किए। उन्होंने कविता लिखने का अनवरन अभ्यास किया और निम्नलिखित भजन की रचना पर गुरू माईराम ने इन्हें पांच रूपये इनाम में दिये।

मूर्ख नर अज्ञानी ज्ञान कर, क्यूं तू उम्र गंवावै सै,
लाख चैरासी योनि मै, आदमदेह मुश्किल तै पावै सै,

15 वर्ष की आयु में सन् 1940 में ही पं0 रामकिशन व्यास ने पिंझुपुरा, कलायत में तीन और म्यौली में चार सांग किए जिससे उनकी पार्टी को पुरस्कृत किया गया। पं0 रामकिशन व्यास को शशीकला सुखबीर, कम्मो-कैलाश, रूपकला-जादूखोरी एवं नल-दमयन्ती आदि सांगों ने विशेष पहचान दिलाई। उनके सांगों की गंूज हरियाणा, राजस्थान एवं उतर प्रदेश के विभिन्न शहरों तक सुनाई देती थी। उनके स्वांगों में लोकजीवन व जमीन से जुड़े जनमानस का जिक्र होता था, जिस कारण हर कोई उनके सांगों का दिवाना था। सांग के प्रचलन के विषय में व्यास जी का कहना था- ‘‘यह विधा 12वीं शताब्दी के आस-पास शुरू हो गई थी। नारनौल के एक ब्राहाण बिहारी लाल ने शुरू की थी। लेकिन मुगलों के समय में सांग खेलने पर पूर्ण प्रतिबन्ध लगा दिया गया था। क्योंकि सांगों के माध्यम से अपनी संस्कृति का ज्ञान और देशभक्ति का ज्ञान कराया जाता था। बिहारी के बाद उनके ही एक शिष्य चेतन ने सांग शुरू किये थे। 17वीं शताब्दी में सांगों का दौर पुनः आरम्भ हुआ, परन्तु इसको आरम्भ करने वाले बाबू बालमुकुन्द गुप्त थे, उसके पश्चात् उनके शिष्य गिरधर तथा कुछ समय बाद शिवकौर ने सांग किये। उसके बाद किशन लाल का आगमन हुआ। पंडित रामकिशन ब्यास जी ने अपनी एक रचना मे भी इस सांग प्रचलन को दर्शाया हुआ है द्य इस प्रकार महान सांगी रामकिशन ब्यास जी का 2 अगस्तए 2003 को निधन हो गया।

‘शशीकला-सुखवीर’ नामक सांगीत में लोक कवि पं0 रामकिशन व्यास ने संयुक्त परिवार के महत्व को दर्शाते हुए सुखवीर के पिता के माध्यम से कहा है-

कहया मान सुखबीर, सीर बराबर सुख कौन्या,
मिल जुलकै रहो सारे, न्यारे होण बराबर दुख कौन्या।।

ऐक के पिछे ऐक लिखो, ग्यारा की मालम पटज्यागी,
ऐक न ऐक से अलग लिखोगे, तो नौ की ताकत घटज्यागी,
इसी तरहां से धन दौलत थारी, दौ हीस्यां मैं बंटज्यागी,
दोनों भाई रहो सीर थारी, सुख से जिन्दगी कटज्यागी।

पं0 रामकिशन व्यास ने 16 सांगों की रचना की जो कि निम्नलिखित हैः-

सती-सावित्री हीरामल जमाल
शशीकला-सुखबीर शरणदे नाई की
रूपकला जादूखोरी धर्मजीत
कम्मों कैलाश हीर-रांझा
फूलकली नल-दमयन्ती
सोमवती-चापसिंह जानी चोर
चन्द्रहास द्रौपदी कीचक
सिरड़ी सत साई सत्यवती।

प्रारम्भिक दौर में जो चार कथाएं गुरू पं0 माईराम अलेवा निवासी से सीखी व उनका मंचन किया वे हैः-

पूर्णमल उखा अनिरूद्ध गोपीचंद चमन सुकन्या

9 फौजी मेहर सिंह:-

फौजी मेहरसिंह का नाम हरियाणवी लोक-साहित्य में सम्मान के साथ लिया जाता है। इनका जन्म 15 फरवरी, सन् 1918 में गांव बरोणा, जिला सोनीपत में हुआ था। पारिवारिक और आर्थिक कठिनाईयों के कारण मेहरसिंह ज्यादा नहीं पढ़ पाये। महज 4 जमात पास मेहरसिंह गांव के अन्य बच्चों की तरह पशु चराने जाते थे। खेतों में, गांव के गोरे व जोहड के किनारे अपने दोस्तों के बीच रागणी सुनाते थे। फौजी मेहर सिंह 2 सितम्बर 1936 को सेना में भर्ती हुए थे और बाद में आई.एन.ए. में भर्ती हो गये थे। फौजी मेहरसिंह ने पं0 लखमीचंद को अपना गुरू माना। सन् 1936 से 1945 तक उन्होंने लगभग 9 साल तक सेना में नौकरी की। फौज में रहकर उन्होंने हर विषय पर रागनी और सांग लिखे। इन्होंने असंख्य मुक्तक रागनियां एवं भजन आदि भी लिखे।

मेहरसिंह की आवाज अत्यन्त मधु एवं सुरीली थी। आजाद हिन्द के नेता सुभाष चन्द्र बोस के साथ कन्धे से कन्धा मिलाकर लडने वाला यह सिपाही अपनी ही तरह का अलग पुरूष था जिसने फौजी जीवन व कला में अनूठा समन्वय स्थापित किया था। ग्रामीण परिवेश में पैदा हुए और पले-बढ़े तथा मेहरसिंह ने ग्रामीण जीवन को ही अपनी रागनियों में समेटा है। समाज में फैली कुरीतियों, उंच-नीच, छूआछूत, गरीबी और अमीरी का भेद का भी अपनी रागनियों में बडा ही मार्मिक चित्रण किया हैः-

परमेशर नै दो जात बणादी, एक टोटा एक साहूकारा,
एक बेल कै दो फल लागैं, एक मीठा एक खारा,
जिसकै धोरै पैसे हो वो, सबनै लागै प्यारा,
जिस माणस कै टोटा आज्या, भाई दें दुतकारा।

रागणी विधा को नया रूप, नयी संवेदना, तथा नया अर्थ देने वाले फौजी मेहर सिंह 15 मार्च 1945 को माण्डले हस्पताल में 29 वर्ष की अल्पायु में ही स्वर्ग सिधार गये।

हरियाणवी ग्रामीण समाज में लोक-विश्वासों, शकुन-अपशकुनों का महत्वपूर्ण स्थान है। समाज में ऐसी लोकधारणा है कि जब कोई व्यक्ति किसी कार्य की सिद्धि के लिए अपने घर से निकलता है तो उस समय, कुत्ते का कान मारना, बाई और कव्वे का बोलना, खाली घड़ा लिये औरत का मिलना, छींकना एवं विधवा नारी का केश बिखेरे मिलना इत्यादि अपशकुन अनिष्टकर माने जाते है। सांगीत ‘सरवर-नीर’ में राजा अम्ब जब जंगल से पते लेकर चलता है तो उस समय उसे इसी प्रकार के अपशकुन दिखाई देते है, इन समय लोक कवि फौजी मेहर सिंह कहते है-

गहरी चिन्ता हुई गात म्हं, धड़-धड़ छाती धड़कै।
पता लेकै चाल्या राव, जब शहर लिया मर पड़कै।।
आग्गै सी नै मिली लुगाई, रीति दोघड़ करकै।
आग्गै तै सीधी छींक मारदी, मुंह के सामी करकै।
होग्ये सौण-कसोण कुंवर, इब पैंडा छुटै मरकै।।

लोककवि फौजी मेहरसिंह ने 16 के लगभग सांगीतों एवं 150 के आसपास अन्य सांगो नौटंकी, गजनादे, हीर राँझा मे भी फुटकड़ रागनियों की रचना की। उनके रचित सांग इस प्रकार से हैः-

चन्द्रकिरण राजा हरिश्चन्द्र
सत्यवान-सावित्री चाप सिंह
शाही लकड़हारा अजीत सिंह राजबाला
सेठ ताराचन्द सरवर-नीर
अंजना-पवन सुभाषचंद्र बोस
काला चान्द
पदमावत
जगदेव बीरमती
वीर हकीकतराय
रूप बसंत
भगत पूर्णमल सुंदरादे

इन्होंने असंख्य मुक्तक एवं 50 के आसपास सपनों के भजन एवं रागनियां आदि भी लिखे।

10 चौ. मुंशीराम जांडली:-

महान कवि चौ. मुंशीराम का जन्म 26 मार्च, सन 1915 को गाँव छोटी जांडली, फतेहाबाद-हरियाणा मे एक कृषक परिवार के अन्दर पिता चौ, धारीराम व माता लीलावती के घर हुआ। वैसे तो ये गाँव जांडली पहले हरियाणा के जिला हिसार क्षेत्र के अंतर्गत आता था। चौ. मुंशीराम की शिक्षा प्रारम्भिक स्तर तक ही हो पायी थी, क्यूंकि उस समय उनके गाँव के दूर-दराज के क्षेत्रों तक शिक्षण स्थानों का काफी अभाव था। इसलिए फिर मुंशीराम जी ने उन्ही के पैतृक गाँव मे बाबा पंचमगिरी धाम के अन्दर ही चौथी कक्षा तक शिक्षा ग्रहण की। उसके बाद फिर मंजूर-ऐ-तक़दीर के तहत उनका ध्यान मनोरंजन के साधनों की तरफ आकर्षित होते हुए संगीत कला व हरियाणवी लोकसाहित्य की ओर मुड़ गया। शुरुआत मे तो मुंशीराम जी अपने मुख्य व्यसाय कृषि के साथ-साथ श्रृंगार-प्रधान रस की ही रचना गाया और लिखा करते थे तथा इन्ही के द्वारा अपना समय व्यतित करते थे। कुछ समय पश्चात् वे अपने ही गाँव जांडली खुर्द निवासी ग़दर पार्टी के सदस्य व देशप्रेमी हरिश्चंद्रनाथ वैद्य की तरफ आकर्षित होने लगे जो एक योग गुरु भी थे और उनकी देशभक्ति विचारों एवं देशप्रेम भावनाओं से प्रेरित होकर अंत मे उन्ही को अपना गुरु धारण किया। फिर बाद मे उनके गुरु हरिश्चंद्र नाथ ने ही अपने शिष्य मुंशीराम की लगन व श्रद्धा और प्रतिभा को देखते हुए इनकी जीवन धारणा को सामाजिक कार्यों और देशप्रेम की ओर मोड़ दिया, जो जीवनभर प्रज्वलित रही। गुरु हरिश्चंद्र नाथ का देहांत शिष्य मुंशीराम के देहांत के काफी लम्बे अर्से बाद सन 1993 मे हुआ। इसीलिए वे अपने शिष्य मुंशीराम से जुडी हुई अनेकों यादों दोहराया करते थे। चौ. मुंशीराम की आवाज बहुत ही सुरीली थी जिसके कारण उनके कार्यक्रम दूर-दराज के क्षेत्रों तक सुने जाते थे। फिर मुंशीराम जी के एक पारिवारिक सदस्य चिरंजीलाल ने बताया कि उनके दो विवाह हुए थे, जिनमे मे से उनकी पहली पत्नी रजनी देवी का कुछ समय पश्चात् निधन हो गया था। उसके बाद फिर चौ. मुंशीराम ने अपनी पहली पत्नी देहांत के बाद पारिवारिक अटकलों से उभरते हुए एक बार अपने ही गाँव मे कलामंच पर अपना कला-प्रदर्शन पुनः प्रारंभ किया तो गाँव के ही कुछ लोगों ने उनका मजाक उड़ाते हुए कहा कि ‘शीराम तेरै पै तो रंडेपाँ चढ़ग्या’। फिर उन्होंने कलामंच पर ऐसे घृणित शब्द सुनकर उस दिन के बाद कथा एवं सांग मंचन को तो उसी समय ही छोड़ दिया, किन्तु अपनी रचनाओं को कभी विराम नहीं दिया, क्यूंकि वे एक बहुत ही भावुक व संवेदनशील रचनाकार थे। उसके बाद पुनर्विवाह के रूप मे वे दूसरी पत्नी सुठियां देवी के साथ वैवाहिक बंधन मे बंधे, जिससे उनको एक लक्ष्मी रूप मे एक पुत्री प्राप्त हुई परन्तु वह भी बाल्यकाल मे ही वापिस मृत्यु को प्राप्त हो गई। उसके बाद तो फिर इस हमारे लोकसाहित्य पर ही एक कहर टूट पड़ा और हमारे अविस्मरणीय लोककवि चौ. मुशीराम जी अपनी 35 वर्ष की उम्र मे पंच तत्व में विलीन होते हुए भवसागर से पार होकर अपनी दूसरी पत्नी सुठियां के साथ-साथ हमकों भी अपनी इस ज्ञान गंगा मे गोते लगाने से अछूते छोड़ गए। फिर हमारी सामाजिक परंपरा के अनुसार इनकी दूसरी पत्नी सुठियां देवी को इनके ही बड़े भाई श्यौलीराम के संरक्षण मे छोड़ दिया गया, जिनसे फिर एक पुत्र का जन्म हुआ जो बलजीत सिंह के रूप मे कृषि व्यवसाय मे कार्यकरत रहते हुए अब वे भी हमारे बीच नहीं रहे।

वैसे तो मुंशीराम जी का अल्प जीवन सम्पूर्णतः ही संघर्षशील रहा है और विपतियों की मकड़ीयों ने हमेशा अपने जाल मे घेरे रखाए क्यूंकि एक तो आवश्यक संसाधनों की कमी, दूसरी आजादी के आन्दोलनों का संघर्षशील दौर और दूसरी तरफ गृहस्थ आश्रम की विपरीत परिस्थितियों के संकटमय बादल हमेंशा घनघोर घटा बनकर छाये रहे तथा अंत मे वे फिर एक झूठे आरोपों के मुक़दमे फांस लिए गए। उसके बाद तो फिर एक प्रकार से झूठे मुक़दमे ने उनकी जीवन-लीला को विराम देने मे अहम भूमिका निभाई थी, क्यूंकि इन्ही के पारिवारिक सदस्य श्री रामकिशन से ज्ञात हुआ कि उन्हें एक साजिशी तौर पर एक असत्य के जाल मे फंसाकर झूठे मुकदमों के घेरे मे घेर लिया। उसके बाद फिर झूठी गवाही के चक्रव्यूह से निकलने के लिए सभी गवाहों से बारम्बार विशेष अनुरोध किया गया, लेकिन उन्होंने चौ. मुंशीराम के प्रति कभी भी सहमती नहीं दिखा। फिर अपने न्याय के अंतिम चरणों मे उनसे उनकी अंतिम इच्छा पूछने पर चौ. मुंशीराम ने तीनों न्यायधीशों- जुगल किशोर आजाद एवं दो अंग्रेजी जजों के सामने अपने आप को निर्दोष साबित करने के लिए अपनी जन्मजात व निरंतर अभ्यास से बहुमुखी प्रतिभा का साक्ष्य देते हुए अपनी अदभुत कला द्वारा एक ऐसी प्रमाणिक व प्रेरणादायक रचना का बखान किया कि उस न्यायालय के जज पर ऐसा सकारात्मक प्रभाव पड़ा कि उसको चौ. मुंशीराम के न्यायसंगत मुक़दमे पर अपनी कलम को वही विराम देना पड़ा, जिससे विरोधियों के चक्षु-कपाट खुले के खुले रह गए। इसीलिए इसी मौके की उनकी एक रचना इस प्रकार प्रस्तुत है कि-

ऐसा कौण जगत के म्हा, जो नहीं किसे तै छल करग्या,
छल की दुनियां भरी पड़ी, कोए आज करैं कोए कल करग्या ।। टेक ।।

राजा दशरथ रामचंद्र के सिर पै, ताज धरण लाग्या,
कैकयी नै इसा छल करया, वो जंगल बीच फिरण लाग्या,
मृग का रूप धारकै मारीच, राम कुटी पै चरण लाग्या,
पड़े अकल पै पत्थर, ज्ञानी रावण सिया हरण लाग्या,
सिया हड़े तै लंका जलगी, वो खुद करणी का फल भरग्या ।
श्री रामचंद्र भी छल करकै, उस बाली नै घायल करग्या ।।

दुर्योधन नै धर्मपुत्र को, छल का जुआ दिया खिला,
राजपाट धनमाल खजानाए माट्टी के म्हा दिया मिला,
कौरवों नै पांडवों कोए दिसौटा भी दिया दिला,
ऐसे तीर चले भाइयों केए धरती का तख्त दिया हिला,
वो चक्रव्यूह भी छल तै बण्याए अभिमन्यु हलचल करग्या ।
कुरुक्षेत्र के घोर युद्ध मैं, 18 अक्षरोहणी दल मरग्या ।।

कुंती देख मौत अर्जुन की, सुत्या बेटा लिया जगा,
बोली बेटा कर्ण मेरे, और झट छाती कै लिया लगा,
वचन भराकै ज्यान मांगली, माता करगी कोड़ दगा,
ज्यान बख्शदी दानवीर नै, अपणा तर्कश दिया बगा,
इन्द्रदेव भिखारी बणकै, सूर्य का कवच-कुण्डल हरग्या ।
रथ का पहियाँ धंसा दिया, खुद कृष्ण जी दलदल करग्या ।।

हरिश्चंद्र नै भी छल करया, विश्वामित्र विश्वास नहीं,
लेई परीक्षा तीनों बिकगे, पेट भरण की आस नहीं,
ऋषि नै विषियर बणकै, के डंस्या कंवर रोहतास नहीं,
कफन तलक भी नहीं मिल्या, फूंकी बेटे की ल्हाश नहीं,
28 दिन तक भूखा रहकै, भंगी के घर जल भरग्या ।
श्री मुंशीराम धर्म कारण, हटके सत उज्जवल करग्या ।।

इस प्रकार इस रचना की चारों कली सुनके और उसकी दूरदर्शिता देखके चौ. मुंशीराम को उन जजों ने उसी समय बरी कर दिया। उसके बावजूद मुकदमा, पेशी, जेल, पुलिस, गृहस्थ विपदा आदि की मझदार मे फंसे हुए भंवर सैलानी के रूप मे देशभक्त चौ. मुंशीराम को अपने जीवन-तराजू के पलड़े मे बैठकर और भी महंगी कीमत चुकानी पड़ी और वो दूसरा अत्यधिक भारी पलड़ा था- तपेदिक का लाईलाज रोग। इस प्रकार मात्र 35 वर्ष की अल्पायु मे जनवरी.1950 को ये वैतरणी नदी को पार करते हुये इस निधि के बन्धनों से मुक्त हो गए और एक महान कवि के रूप मे अपने लोक साहित्य के स्वर्णिम अक्षरों को हमारी आत्माओं मे चित्रित कर गये।
अगर चौ. मुंशीराम के कृतित्व पर प्रकाश डाला जाये तो उन्होंने अपने साहित्यिक जीवन मे अनेकों सांग/कथा और फुटकड़ कृतियों की रचना की, परन्तु उस आजादी की लड़ाई के मार्मिक दौर मे संरक्षित न हो पाने के कारण उनकी अधिकांश कथाएं काल के गर्त मे समा गई। वर्तमान मे उनकी लगभग कुछ प्रमुख कथाओं के साथ अन्य कथाओं की कुछ इक्की-दुक्की रचना ही संकलित हो पायी, जैसे. मीराबाई, चंद्रकलाशी, महाभारत, हीर-राँझा इत्यादि, जो ‘मुंशीराम जांडली ग्रंथावली’ नामक प्रकाशित पुस्तक मे संग्रहित है। उनके रचित इतिहासों का प्रमुख सार इस प्रकार है-

राजा हरिश्चंद्र पूर्णमल भगत जयमल.फत्ता
पृथ्वीराज चौहान अमरसिंह राठौड़ फुटकड़ रचनाएँ

11 भारत भूषण सांघीवाल :-

लोक-कवि भारतभूषण सांघीवाल उर्फ श्री नारायण शास्त्री का जन्म 28 फरवरी 1932 को ग्राम सांघ्ज्ञी जिला रोहतक मे हुआ। आपके दादा पं. विद्यापति अपने समय के सिद्धहस्त वैध थे और पिता पं. छोटेलाल विद्यासागर संस्कृत के अच्छे विद्वान थे। इनकी माता का नाम चन्द्रकला देवी था, जो एक धार्मिक प्रवृति की महिला थी। दादा, पिता और माता के संस्कारों का प्रभाव बालक भारतभूषण पर भी पड़ा। इनकी प्रारम्भिक शिक्षा उर्दू में हुई। आठ वर्ष की आयु में ही पिता जी का साया सिर से उठने के कारण सांघीवाल को अनेक समस्याओं से जूझना पड़ा। अनेक संघर्षो को झेलते हुए इन्होंने सन् 1950 में पंजाब विश्वविद्यालय, चण्डीगढ से शास्त्री की परीक्षा उतीर्ण की। तदन्तर साहित्यरत्न और आयुर्वेदरत्न की परीक्षाएं भी उतीर्ण की।40
सांघीवाल जी ने सन् 1950 में प्रसन्नी दवी से विवाह किया। सन् 1951 में संस्कृत के अध्यापक के रूप में अध्यापन कार्य प्रारम्भ किया। उस समय आप नारायण शास्त्री के नाम से प्रसिद्ध थे। कुछ समय पश्चात् आप ‘भारतभूषण सांघीवाल के नाम से विख्यात हुए। चीन आक्रमण के समय सन् 1962 में आपने देशभक्ति से ओत-प्रोत कविताएं लिखी तथा क्रान्तिगाम शीर्षक से इनको प्रकाशित करवाया। सन् 1965 में जय-जय हिन्दुस्तान हरियाणवी नाटक का अनेक स्थानों पर मंचन किया। हरियाणा की सर्वोच्च साहित्य संस्था हरियाणा साहित्य अकादमी ने आपकी सूरज-पांच तथा मांगलकलशम् काव्य कृतियों को प्रथम पुरस्कार से सम्मानित करके इन्हें गौरवान्वित किया है। इसके अलावा आजादी के दीवाने और संस्कृत गीत मंजरी को अकादमी ने प्रकाशन अनुदान प्रदान करके इनका सम्मान किया है। इनकी उल्लेखनीय सेवाओं के उपलक्ष्य मे सन् 1985 ई. में हरियाणा सरकार द्वारा राज्य शिक्षक पुरस्कार तथा 1987 मे भारत सरकार द्वारा राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कार से सम्मानित किया गया। इनके 6 हरियाणवी संगीत रूपक, सूरजकौर, चांदकौर, झांसी रानी, सुभाष चन्द्र बोस, भगत सिंह एवं उधम सिंह आकाशवाणी रोहतक से प्रसारित हो चुके हैं।
लोक कवि भारतभूषण सांघीवाल ने धर्मवीर हकीकतराय नामक सांगीतरूपक में सर्वधर्म समभाव के सिद्धान्त को इस प्रकार प्रस्तुत किया-

सब धर्मो का सार एक सै, मूर्ख करै लड़ाई।
एक बाप के बेटे सै हम, सारे भाई-भाई।।।
धर्म एक साधन, दर्शन ईश्वर के करावै सै।
मन रै इन्द्रियां पै अंकुश यू लगावै सै।।

डॉ रामपत यादव द्वारा सम्पादित हरियाणवी काव्य ग्रन्थावली में जो हरियाणवी काव्य दिया गया है वह हरियाणवी सांगीत का ही एक रूप है जिसका मंचन किया जा सकता है-

नरसी भगत परशुराम चरित सीताहरण श्रीकृष्ण जन्म
कीचक वध धर्मवीर हकीकत राय महाराणा प्रताप छत्रपति शिवाजी वीरबाला चंचलकुमारी फूलझड़ी स्वामी दयानन्द सरस्वती
महात्मा गांधी जवाहर लाल नामक शीर्षक से इनकी रचना की गई है।

12 पं0 लहणासिंह अत्री :-

आधुनिक युग के सांगीत लेखकों में पं0 लहणा सिंह अत्री का प्रमुख स्थान है। इनका जन्म 03.12.1950 ई. को गांव फफड़ाना, तहसील असन्ध, जिला करनाल में हुआ। इनके पिता का नाम श्री अमीलाल तथा माता का नाम श्रीमती सरती देवी है। श्री लहणा सिंह अत्री बचपन से ही सांग देखने में रूचि रखते थे। जब वे छोटी श्रेणी मंे गांव के स्कूल में पढ़ते थे, तो गावं के आस-पास में सांग होता, उसे देखने पहुंच जाते थे। अत्री जी पं0 लखमीचंद जी की कविताई से प्रभावित हैं, संगीत में रूचि होने के कारण इन्होंने मुक्तक रागनी की रचना करना अपने विद्यार्थी जीवन में ही आरम्भ कर दिया था। अत्री जी ने पं0 मांगेराम के शिष्य पं0 लख्मीचंद भम्भेवा निवासी को अपना गुरू धारण किया। यद्यपि पं0 लहणा सिंह अत्री कभी पं0 लख्मीचंद भम्भेवा की सांगीत मण्डली में नही रहे परन्तु उन्होनंे अपनी अन्तरात्मा से उनको अपना गुरू मान लिया। इनकी एक भी ऐसी रचना नहीं जिसमें गुरू स्मरण न किया गया हो।

लोक कवि पं. लहणा सिंह ने अभी तक 7 सांगों और कुछ मुक्तक रागनियों एवं भजनों की रचना की है। अपनी रचनाओं मे अत्री जी ने अनेक पौराणिक, ऐतिहासिक एवं सामाजिक घटनाओं का उल्लेख किया है तथा अनेक सामाजिक समस्याओं को भी अपने सांगीतों मंे स्थान दिया है। दहेज प्रथा की समस्या को गम्भीरता से उठाते हुए एक छंद मे वे कहते हैं-

ईब जागृति आण लागरी, मतना करै विचार इसा,
कार, स्कूटर, फ्रीज मांगता, ना चाहिए घरबार इसा,
जडै़ नणंद जैठाणी सास पीटती, के फूकैगी परिवार इसा,
तेल छिडक खुद आग लगादे, के चाहिए था भरतार इसा,
छल, कपट, सौ कोस दूर यू लहणा सिंह देख्या भाल्या।।

इसी प्रकार बाल-विवाह, बेमेल विवाह, प्रदूषण, जनसंख्या वृद्धि इत्यादि समस्याओं को अपने सांगीतों मंे उठाया है। आप सन् 06.10.1979 से महर्षि दयानन्द विश्वविद्यालय रोहतक में कार्यरत है।

पं0 लहणा सिंह अत्री सांगों का मंचन नहीं करते वे सांगीत लेखक है इन्होंने 7 सांगीतों की रचना की है जो प्रकाशित हो चुके है-

शिवजी का ब्याह बल्लभगढ का नाहर नज्मा कमली
रामरतन का ब्याह प्रीतकौर चन्द्रपाल हीरामल जमाल।

13 डा. रणबीर दहिया :-

डा. रणबीर सिंह दहिया का जन्म गांव बरोणा, जिला सोनीपत के कृषक परिवार में 11 मार्च 1950 को हुआ। हरियाणा की साहित्यिक गतिविधियों मे इनका महत्वपूर्ण योगदान रहा है। इन्होंने हिन्दी और हरियाणवी दोनों ही भाषाओं मे रचनाएं लिखी है। सन् 1983 ई0 में इनका उपन्यास मलबे के नीचे प्रकाशित हुआ। जिसमें इन्होंने मलबे के नीचे दफन उर्जा को सशक्त अभिव्यक्ति दी है। वर्ष 1998 ई0 में इनका कहानी संग्रह पोस्टमार्टम प्रकाशित हुआ जिसमें सात कहानियों का संकलन है।

डॉ. रणबीर दहिया का लेखन आम आदमी, धरती से जुडे व्यक्ति का लेखन है। शायद इसीलिए इन्होंने स्थानीय भाषा हरियाणा में भी अनेक सांगों एवं मुक्तक रागनियों की रचना की है। उन्होने शहीद जसबीर सिंह, चम्पा चमेली, जलियांवाला बाग, सफदर हाशमी, जालिम अमरीका आण्डी सद्दाम, रणबीर चांदकौर, बाजे भगत, फौजी मेहर सिंह, किस्सा प्रधानमन्त्री तथा उधम सिंह आदि सांग की मुक्तक रागनियां नया दौर-1 व नया दौर-2 मे प्रकाशित हुई है। इसके अलावा रानी लक्ष्मीबाई, भूरा निगाहिया, फूल कमल एवं फौजी किसान नामक शीर्षक से प्रोग्रेसिव प्रिंटर्स, ए-21, झिलमिल इंडिस्ट्रियल एरिया शाहदरा, दिल्ली से भावी प्रकाशन में हैं तथा नया दौर भाग-4 संकट छाग्या हरियाणवी गती नाटिका- रूखाला प्रकाशन, पी-27, इन्द्रप्रस्थ कालोनी, रोहतक-124001 हरियाणा से प्रकाशित हो चुकी है।

डा. दहिया की रागनियों की लगभग 15-16 आडियो-कैसेटस भी तैयार हो चुकी है। इनकी अनेक कहानियां, लेख नाटक, पत्र-पत्रिकाओं में भी प्रकाशित होते रहते है। इन्होंने फौजी मेहर सिंह की रागनियों का संकलन एंव सम्पादन भी किया है। हरियाणवी साहित्य एवं सामाजिक सेवाओं मे अपना महत्वपूर्ण योगदान देने वाले डाॅ0 रणबीर सिंह दहिया वर्तमान में व्यावसायिक दृष्टि से वरिष्ठ सर्जन के रूप में पी.जी.आई. रोहतक से लोगों को शारीरिक विकारों से निजात दिला रहे है। इसके साथ ही ये अनेक सामाजिक सेवा संस्थाओं से जुड़ कर उनको सामाजिक विकृतियों से लड़ने की प्रेरणा भी दे रहे है।

रणबीर-चांदकौर नामक सांगीत में डा. रणबीर सिंह दहिया ने हरियाणा प्रदेश में छोटे किसान परिवारों की आर्थिक स्थिति बिगड़ने का कारण मंहगाई को माना है-

दो किल्ले धरती सै मेरी, मुश्किल होया गुजारा रै
खाद बीज सब मंहगे होगे, कुछ ना चालै चारा रै।।

14 डा. चतरभुज बंसल :-

हरियाणवी लोक कवि डॉ. चतरभुज बंसल जी का जन्म 1 अप्रैल सन् 1951 को गांव सोथा जिला कैथल मे हुआ। इनके पिता का नाम लाला साधु राम बंसल तथा माता का नाम श्रीमती किशनी देवी है। चतरभुज बंसल जी ने आठवीं तक शिक्षा प्राप्त की। उन्हीं के शब्दों में- ‘‘हमारे घर मे कभी भी कोई साहित्यिक वातावरण नहीं रहा और ना ही कोई इस प्रकार का माहौल ही था जो मुझे विरासत के रूप में मिला हो। घरेलू माली हालत बडी दयनीय थी और तो और रहने के लिए अपना घर का मकान भी नहीं था। फिर भी घरवाले यही चाहते थे कि मैं पढ़ जाऊँ। स्कूली शिक्षा मे मेरा मन बिल्कुल नहीं लगता था। पता नहीं मैं आठवीं तक भी कैसे पढ़ गया। स्कूल की शिक्षा के दौरान मुझे पाठ्यक्रम की पुस्तकों से दूसरी पुस्तकें पढ़ने का अधिक शौक था। गुरू धारण सम्बन्धी इनके विचार इस प्रकार है- ‘‘दिल्ली से जो सांयकाल छः बजकर बीस मिनट पर हरियाणवी रागनियों का प्रोग्राम आता था, उसे तो मैं बिना नागा सुनता था और उसे सुनकर मुझे ऐसा होता जैसे मैं भी इस प्रकार के हरियाणवी गीत लिखूं। आखिर मैंने देवों के देव महादेव भगवान शंकर जी को अपना आराध्य देव, ईष्ट देव, गुरूदेव मानकर लिखना शुरू कर दिया और आज तक लिख रहा हूं।’’48 अर्थात् भगवान शिव शंकर को अपना गुरू माना।

डा. चतरभुज की रूचि हरियाणवी कविताएं लिखने में अधिक है। इन्होंने समसामयिक सामाजिक समस्याओं पर आधारित भजनों, रागनियों व सांगों की रचना की है। इनकी लगभग बीस पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी है और अनेक अप्रकाशित है। जिनकी निकट भविष्य मंे प्रकाशित होने की संभावना है। इनकी निम्नलिखित रचनाएं प्रकाशित हो चुकी है- ज्ञानमाला 1991, आत्मज्ञान 1995, ज्ञानधारा 1996, गजल संग्रह 1999, ज्ञानबाण 1999, ज्ञानगीत 2000, आजादी के भगत 2001, गीत माला 2002, ज्ञानगंगा 2003, रत्नमाला 2003, सांग-माला पहला भाग 2004। उसके अलावा विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं जैसे हरियाणा संवाद, हरियाणा लीडर, हक-परस्त, दैनिक सीमा, संदेश आदि पत्र-पत्रिकाओं में 500 से अधिक कविताएं प्रकाशित हो चुकी है।49
ध्रुव का जन्म नामक सांगीत मंे लोक कवि ने समाज में प्रचलित बेमेल या अनमेल विवाह एवं बहु-विवाह रूपी समस्या को उठाया है। जिस लड़की को उसकी इच्छा के विरूद्ध ब्रूाहा गया हो और वह भी पहले से विवाहित पुरूष से तथा शादी का कारण उसकी अपनी सौत हों तो उस लड़की के मन में बदले की भावना घर करना स्वाभाविक है। राजा उतानपाद की छोटी रानी सुनिचि अपनी बड़ी बहन सुनीति को बेमेल विवाह करवाने पर उलहाना देती है-

यू बुड्डा मैं याणी स्याणी, शर्म लिहाज नहीं आई ऐ।
भरकै घूंट सबर की माला, इसके गल मैं पाई ऐ।
बाप बराबर लागै से यू, क्यूं इस गेलै लाई ऐ।
किस तरीयां बोलूं हांसू मैं, इसे फिकर नै खाई ऐ।।

हरियाणवी सांग माला में डा. चतरभुज बंस के निम्नलिखित सांगीत प्रकाशित हुए है-

कृष्ण जन्म नरसी भगत प्रह्लाद भगत ध्रुव भगत सरवर-नीर

सांग का स्वरूप, परम्परा और सांग परम्परा की देंन:-

सांग-विधा:-
सांग के प्रचलन के विषय में लोककवि रामकिशन व्यास जी का कहना था- ‘‘यह विधा 12वीं शताब्दी के आस-पास शुरू हो गई थी। नारनौल के एक ब्राहाण बिहारी लाल ने शुरू की थी, लेकिन मुगलों के समय में सांग मंचन/खेलने पर पूर्ण प्रतिबन्ध लगा दिया गया था, क्योंकि सांगों के माध्यम से अपनी संस्कृति का ज्ञान और देशभक्ति का ज्ञान कराया जाता था। बिहारीलाल के बाद उनके ही एक शिष्य चेतन ने सांग शुरू किये थे। 17वीं शताब्दी में सांगों का दौर पुनः आरम्भ हुआ, परन्तु इसको आरम्भ करने वाले बाबू बालमुकुन्द गुप्त थे, उसके पश्चात् उनके शिष्य गिरधर तथा कुछ समय बाद शिवकौर ने सांग किये। उसके बाद फिर बालमुकुन्द जी के ही शिष्य प. किशनलाल का आगमन हुआ, जिन्होंने सांग विधा को अत्यंत महत्वता प्रदान की। फिर उसके बाद तो लगभग 200 ईण् बाद सर्वकालीन सर्वश्रेष्ठ सुर्यकवि प. लख्मीचंद जी ने इस सांग विधा के ऐसे आयाम स्थापित किये जिनमे सदा-सदा के लिए अमरत्व की आहुति डाल दी।
अब मै यहाँ कुछ इतिहासकारों, बुजुर्गों, अध्ययेताओं, रुचिकारों, जैसे. शंकरलाल यादव, साधुराम शारदा, राजाराम शास्त्री, देवीशंकर प्रभाकर, कृष्णचन्द्र शर्मा, राजेंद्र स्वरूप वत्स, डॉण् पूर्णचंद शर्मा, लक्ष्मीनारायण वत्स, डॉ. बाबूलाल, डॉ लालचंद गुप्त, डॉण् रामपत यादव, और अन्य सहायक पुस्तकों की सहायता से हरियाणवी लोक-कवियों की अनुमानित व प्रमाणिक तौर पर कुछ मुख्य जानकारी पर प्रकाश डालने की कौशिश कर रहा हूँए जो इस प्रकार है-

अ.क्र. लोककवि का नाम जन्म (ई.) मृत्यु (ई.) टिप्पणी

1 ब्राहमण बिहारीलाल 1200 1200 ई. के आसपास
2 चेतन शर्मा 1200 बिहारीलाल जी के शिष्य
3 बालमुकुन्द गुप्त 1700 1700 ई. के आसपास
4 गिरधर 1700 बालमुकुन्द जी के शिष्य
5 शिवकौर 1700 गिरधर जी के शिष्य
6 किशनलाल भाट 1700 बालमुकुन्द जी के शिष्य
7 सादुल्ला 1760 1760 ई. के दशक में
8 बंसीलाल 1802
9 अम्बाराम 1819 कार्यकाल
10 पंडित बस्तीराम 1841 1958
11 अहमद बख्श 180 1850 ई. के आसपास
12 स्वामी शंकरदास
13 अलीबख्श 1854 1899
14 योगेश्वर बालकराम अलीबख्श के समकालीन
15 सरदारी बेगम 1860 कार्यकाल
16 हिरादास उदासी 1861 1861 ई. से पूर्व
17 ताऊ सांगी 1878 1878 ई. अनुमानित
18 जमुआ मीर 1879 1959
19 जसवंत सिंह वर्मा 1881 1957 टोहावनी
20 पंडित दीपचंद 1884 1940
21 हरदेवा स्वामी 1884 1926
22 ब्राह्मण मानसिंह 1885 1955
23 पंडित माईराम 1886 1964
24 सूरजभान वर्मा 1889 1942
25 पंडित शादीराम 1889 1973
26 पंडित सरुपचंद 1890 1956
27 पंडित नेतराम 1890 1890 ई. के दशक मे
28 रामलाल खटीक 1890 1890 ई. के दशक मे
29 बाजे भगत 1898 1936
30 पंडित हरिकेश पटवारी 1898 1954
31 सोहन कुंडलवाला
32 पंडित नत्थुराम 1902 1990
33 पंडित लख्मीचंद 1903 1945
34 गुलाब सिंह- उमरावतीया
35 पंडित मांगेराम 1906 1967
36 श्रीराम शर्मा 1907 1966
37 पंडित नन्दलाल 1913 1963
38 दयाचंद मायना 1915 1993
39 मुंशीराम जांडली 1915 1950
40 पंडित किशनलाल 1887
41 पंडित जगदीशचन्द्र वत्स 1916 1997
42 पंडित माईचंद 1916
43 राय धनपत सिंह 1916 1979
44 पंडित जयनारायण
45 श्री दयाचंद गोपाल 1916
46 पंडित रामानंद आजाद 1917
47 फौजी मेहरसिंह 1918 1944
48 सुल्तान शास्त्री 1919
49 मास्टर नेकीराम 1919 1996
50 कृष्णचंद शर्मा 1922
51 खेमचंद स्वामी 1923
52 चंद्रलाल भाट (चन्द्र बादी) 1923 2004
53 ज्ञानीराम शास्त्री 1923
54 पंडित रामकिशन ब्यास 1925 2003
55 मास्टर दयाचंद आजाद 1925 1945 सिंघाना निवासी
56 चन्दगीराम 1926 1991
57 पंडित रघुनाथ 1928 1978
58 पंडित तेजराम 1931
59 भारत भूषण सांघीवाल 1932
60 बनवारी लाल ठेल 1932 1983
61 झम्मनलाल 1935
62 महाशय सरूपलाल 1937 2013
63 पंडित जगन्नाथ 1939
64 पंडित तुलेराम 1939 2008
65 पंडित लख्मीचंद 1945 भम्भेवा निवासी
66 झम्मन लाल 1948
67 पंडित राजेराम संगीताचार्य 1949
68 पंडित लहंणासिंह अत्री 1950
69 पंडित बलवंतसिंह
70 बंदा मीर
71 डॉ रणबीर दहिया 1950
72 डॉ चतुर्भुज बंसल 1951

लोकनाटयों का वर्गीकरण :-

प्रत्येक सांग अपने आप में कुछ विशिष्टा रखता है और सांग बहुतायत में उपलब्ध है। ऐसी स्थिति में सांगों का वर्गीकरण करना अनिवार्य लगता है। इस अध्ययेता से पूर्व भी अन्य अध्ययेताओं ने अपने-अपने हिसाब से विभिन्न लोक कवियों के सांगों का वर्गीकरण किया है। वर्गीकरण का आधार ढूंढने की कठिनाई सभी के सामने रही है और इस अध्ययेता के सामने भी; क्योंकि सांगों की कथावस्तु बहुआयामी है, इसलिए उनकी अपवर्जी श्रेणी बनाना कठिन था। फिर भी यहां उसका प्रयास किया गया है। मुझे डा. पूर्णचन्द शर्मा के पं0 लखमीचंद के सांगों के वर्गीकरण के संबंध में उनकी इस टिप्पणी से बल मिला है कि ‘‘…ऐसी परिस्थिति में प्रतिपाद्य की मूल प्रवृतियों के आधार पर ही उनके सांगों को वर्गीकृत करने का प्रयास किया जा सकता है।’’ और शोधार्थी ने उन सांगों की मूल प्रवृतियों के आधार पर ही उन्हें वर्गीकृत करने का प्रयास किया है।

निष्कर्ष:-

हरियाणा लोकनाट्य की एक सशक्त एवं दीर्घ स्वस्थ परम्परा रही है हरियाणावासी सांगों के माध्यम से मनोरंजन, ज्ञान, जीवन के संचित अनुभव समुच्चय का ज्ञान प्राप्त करते है। विशेषतः ग्रामीण शस्य श्यामला भूखण्डों मंे रागनियों से झंकृत इस नाट्यशैली का अपना ही वर्चस्व है।

प्रमुख सांगीतकार पं. लखमीचंद, बाजे भगत, प. नन्दलाल, पंडित हरिकेश पटवारी, पंडित रघुनाथ, पं. मांगेराम, धनपत सिंह, चन्द्रलाल भाट उर्फ बेदी, पं. रामकिशन व्यास तथा फौजी मेहर सिंह, चौ. मुंशीराम, प, जगन्नाथ, भारतभूषण सांघीवाल, पं. लहणा सिंह अत्री, डा. रणबीर सिंह दहिया एवं डा. चतरभुज बंसल इत्यादि। जिनमें सरस्वती के वरदपुत्र बाजे भगत, पं. लखमीचंद, पं. मांगेराम, धनपत सिंह, चन्द्रलाल भाट उर्फ बेदी, पं. रामकिशन व्यास तथा फौजी मेहरसिंह आदि अत्यन्त विलक्षण प्रतिभा सम्पन्न माने जाते है। लोक-संस्कृति के इन संवाहक लोकनाट्यकारों को हरियाणा के समाज को प्रदेय कम नहीं आंका जा सकता।

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