जीवन ज्योति

मैं तेज भरी विश्वास की इक लौ सी जली
स्वयं जलकर जग प्रकाशित कर रही
मेरा हर पथ बाधाओं से है भरा
पवन वेग सा मुझ पर गुर्राया
कभी रही घोर तिमिर की छाया
काली घटा ने भी डाला यहां डेरा
भयावह दैत्य कोई भ्रमित करने आया
अन्धकार स्व आधिपत्य जमाने कोआया
आशा और निराशा लगाती रही नित फेरी
ह्रदय तारों को झंकृत करती रही
तो कभीअरमानों के पंख लगा मैं उड़ चली
अम्बर तक छूने की है चाहत पली
सैलाब उमड़ा लिए बाणों की धार
पथ की बाधाएं बनीं रही चाहे अनेक
बढ़ चली मैं स्वप्न सजा अनेक
मैं अडिग रही बढ़ती ही चली
निज पथ पर चिन्ह गढ़ती चली
धुन अपनी में सदा खोज रही
अंतर्मन को झकझोर रही
बंद कपाट नित खोल रही
विस्मित होकर भी पार चली
स्वाभिमान भरी बढ़ती ही चली
रुकती ना कभी थकती मैं कभी
बढ़ती ही चली पार चली
नित जलकर कुछ खोज रही
मैं विश्वास भरी इक लौ सी जली
स्वयं जलकर जग को प्रकाशित कर रही

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