May 12, 2021 · कविता
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“जीवन की शर्त”

जीवन की शर्त यहीं है,
क्या क्या बदलोगे,
समस्याओं का गर्त यहीं है,
हाथ बढ़ाओ,
चलो एक दीप जलाओ,
मृत्युलोक का स्वर्ग यहीं हैं।

जीवन में आनंद करो,
ईश्वर को मानो,
खुद जानो,न कोई पाखंड करो,
कर्ण तुम्हारे सुनने वाले,
मुख से एक सौगंध करो,
अंबर सा खुद को स्वछंद करो।

जीवन जड़ न हो,
अब ऐसा कोई प्रण न हो,
जब हो खुशियों का रण हो।
क्या द्वंद विचारों का,
शील,सुशील संस्कारों का,
इस लोक में वरण हो ।।

@निल (सागर, मध्य प्रदेश)

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अनिल अहिरवार
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साधारण सी लेखनी हूं, शिक्षा का छोटा सा दीप, जो डटा हुआ है, हवा के... View full profile
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