जीने की वजह

मुट्ठी भर लम्हातों का सिलसिला है ज़िन्दगी
कुछ हसीन लम्हों की तलाश में हम जिए जा रहे हैं,
कुछ नहीं है हमारा जिसको अपना कह सकें,
बस एक ख़ुशी की तलाश में जिए जा रहे हैं,
अब हम क्या दिखाएं अपने जख्म ज़माने को,
जो हमने अपने ख्वाबों को सजाने में खाए हैं,
फिर भी हर रोज हम एक नया ख्वाब सजा रहे हैं,
कुछ हसीन लम्हों की तलाश में हम जिए जा रहे हैं
दो पल की हँसी को तरस गए हैं होंठ हमारे,
हँसी पर हमारी क़ातिल होने की इल्जाम आये हैं,
हमारी हालत पर दुनिया वाले हँसे जा रहे हैं,
कुछ हसीन लम्हों की तलाश में हम जिए जा रहे हैं
एक मुद्दत से हमें मुस्कुराते नहीं देखा किसी ने,
ज़माने ने हमारे मुस्कुराने पर भी पहरे बिठाये हैं,
रंगहीन हो चली हैं राहें हमारी ज़िन्दगी की,
ज़िन्दगी को रंगीन बनाने की खातिर जिये जा रहे हैं,
कुछ हसीन लम्हों की तलाश में हम जिए जा रहे हैं
हर एक कदम सोच समझ कर ही उठाना है,
हमारे पग पग पर ईश्वर ने कांटे बिछाये हैं ,
हर जन को खुशियाँ ही बांटना चाहते थे हम,
खुशियाँ बांटने की भी क्या खूब सजा पायी है,
न जाने कब अपनी ही खुशियाँ गँवा आये हैं ,
सबके लिए अपने ही दिल को छलनी किये जा रहे हैं,
कुछ हसीन लम्हों की तलाश में हम जिए जा रहे हैं
ईश्वर ने भी हमको असफलताओं से ही रूबरू कराया,
हम बस भाग्य के खिलाफ जंग ही लड़ते जा रहे हैं,
कुछ हसीन लम्हों की तलाश में हम जिए जा रहे हैं

“सन्दीप कुमार”

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3 साझा पुस्तकें प्रकाशित हुई हैं | दो हाइकू पुस्तक है "साझा नभ का कोना"... View full profile
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