गज़ल/गीतिका · Reading time: 1 minute

” ——————————————- जीना भी दुश्वार है ” !!

बात बात पर गाली देते , एसा चढ़ा बुखार है !
राजनीति में आम हो गया , कहते इसे खुमार है !!

तरह तरह के बोल सहेजे , बेलगाम है भाषा !
जनता आंक रही है सब कुछ , अवमूल्यन उपहार है !!

सुविधाओं का नशा चढ़ा है , औ राजनीति का दम्भ !
संस्कारों की मिली विरासत , यही करे बीमार है !!

वोट विभाजित यहां हो गये , जातिवाद है पनपा !
कट्टरपंथी सोच बढ़ी है , जीना भी दुश्वार है !!

भीड़तंत्र में दांव लगी जो , जान हो गई सस्ती !
प्रजातन्त्र के दुष्परिणामों से , यहां किसे इनकार है !!

आज फिजां में जहर घुला है , दम सबका घुटता है !
रूठी रूठी यहां लगे अब , अपने चमन बहार है !!

आमजनों की चिंता किसको , है बस भाषणबाज़ी
वोटर ने तो वोट कर दिया , देश फंसे मंझधार है !!

कुर्बानी देते जवान हैं , यह कहलाती सेवा !
राजनीति में भाव देश का , लगता नहीं शुमार है !!

बृज व्यास

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